शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

lost in the metro...

'Look my princess, these are your private body parts.' मेट्रो स्टेशन के प्लेटफार्म पर लगे टीवी सेट्स में  एक महिला उसके सामने रखी टेबल पर एक रबड़ की गुडिया लिटाये हुए अपनी बच्ची को यह जानकारी दे रही थी|   महिला ने गुडिया के पेट के आसपास की जगह को दबाते हुए डेमोंसट्रेट किया,   'Don't let anybody touch these parts and if anybody does so, don't stay mum, you have to tell it to your mom.'

इस विज्ञापन में सब डूब ही गए थे, विक्रम भी मंत्रमुग्ध होकर उस विज्ञापन को बार बार रिपीट होते  देख रहा था|

'ज्यादा फूलो  मत, उधर देखो' वेताल ने कहकर उसके रंग में भंग डाल दिया| विशाल टीवी सेट के ठीक नीचे एक बीस बाईस साल का  लड़का अपनी हम उम्र लड़की की कमर को दोनों हाथों में भरकर उसे अपने से एकदम सटाकर खडा था|  पीक-ऑवर्स चल रहे थे, भीड़ बढ़ती जा रही थी| लड़का और लड़की इन सबसे एकदम बेखबर थे| बीच बीच में लड़की घूमकर कुछ कहने लगती थी और लड़के के हाथ उसकी कमर को छोडकर कभी उसकी गर्दन पर रेंगने लगते थे और कभी उसके हाथों को सहलाने लगते थे| फिर जल्दी ही वो दोनों अपनी उसी पहले वाली मुद्रा में आ खड़े होते थे| आसपास के माहौल की कोई परवाह नहीं,  भीड़ में से बहुत से लोग खुद उन्हें इग्नोर कर रहे थे, कुछ ललचाई आँखों से और कुछ उन्हें हेय  दृष्टि से देख रहे थे|

टीवी अब भी बदस्तूर चल रहा था लेकिन विक्रम का ध्यान अब उधर नहीं था|

वेताल उसके कानों में फुसफुसाया, 'लड़की की आंखों में क्या दिख रहा है?'  

विक्रम ने बताया, 'भोलापन, सादगी, विश्वास'

'और लड़के की आंखों में?'

'पशुता, मौकापरस्ती'

'विक्रम, जरा गौर से देखो| लड़के के दांत और नाखूनों  की तरफ देखो|' विक्रम ने गौर से देखा, लड़की की अल्हड हरकतों के साथ साथ लड़के के दांत और नाखून धीरे धीरे बढते जा रहे थे| विक्रम के सर में और ज्यादा सांय सांय होने लगी थी|

वेताल ने फिर से विक्रम को उसके कर्तव्य की याद दिलाई, 'चुप मत रहो, अन्याय को होने देने से रोको|' विक्रम के कानों में गूंजती आवाज तेज, और तेज होती जा रही थी|  'सब समझते बूझते भी तुम कुछ नहीं करोगे तो तुम्हारे सर के सौ टुकड़े हो जायेंगे और  मैं फिर से अपने ठिकाने पर लौट जाऊंगा|'

आंखों के सामने दीखते दृश्य और कानों में सीसे की तरह पिघलते शब्द उसे असहनीय लगने लगे थे|  जोर से चीखते हुए उसने वेताल से कहा, 'अब ज़माना बदल रहा है वेताल, इस स्टेज पर हस्तक्षेप करने वाला खुद सौ जूते खायेगा| आधुनिकता के पक्षधरों के सामने पिछडा,  सामंतवादी, प्रेम का दुश्मन  और जाने क्या क्या कहलायेगा|  आजकल इंतज़ार किया जाता है दुर्घटनाओं के होने का, उसके बाद कटघरों में सबको लाया जाएगा| फिर होगा विमर्श और दिए जायेंगे फतवे|   तुझे रुकना है तो रुक नहीं  तो जा अपने खूंटे पर, मैं फिर से तुझे ले आऊँगा|  उस फटीक की तो मुझे आदत है, झेल लूंगा| बल्कि  ले, तू भी क्या याद रखेगा, मैं ही तुझे यहाँ पटक कर जाता हूँ|' कहकर विक्रम ने वेताल को वहीं मेट्रो प्लेटफार्म पर पटका और जल्दी से मेट्रो के बंद होते दरवाजे के भीतर चला गया|  प्लेटफार्म पर गिरे हुए बेताल को हम सबने सुना, विक्रम को भाई बाप की गालियाँ दे रहा था|  भीड़ आ रही थी, जा रही थी|  टीवी पर वही विज्ञापन फिल्म भी रिपीट हो रही थी, ठीक नीचे प्लेटफ़ार्म पर एक कबूतरी लहक लहक कर अब भी बिलाव पर कुर्बान होती दिख रही थी| 

तब से देर रात वाली मेट्रो पकड़ने वाले कई यात्रियों ने गवाही दी है कि वेताल अपने विक्रम को ढूँढता फिर रहा है|

गूढ़ शब्द:

फटीक            -          (वो वाली ऐसी तैसी जो बिना किसी सार्थक उपलब्धि के करवाई जाती है)



160 टिप्‍पणियां:

  1. कोई भी बात सटीक तरीके से समझाने में मास्टरी है आपकी...

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    1. ये छूट गया था कहना-

      मैं और तुम
      खुद ही की सोचते
      कई हैं ऐसे...

      करते काम
      सिर्फ़ स्व के लिए ही
      क्या बदलेगा!!

      कौन समझे?
      और समझाए भी
      करो खुद ही...

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    2. और क्या, खुद करो| कम थोड़े ही हो हमसे, क्यों किसी का रास्ता देखा जाए? वो क्या कहते हैं कि हमारे भरोसे न रहना, हा हा हा ...

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  2. विक्रमादित्य जी,
    कितनी अजीब बात है, यहाँ पश्चिम में लोगों ने सिगरेट पीना लगभग छोड़ ही दिया है,
    बच्चे अब १८ साल के बाद भी, माँ-बाप का घर नहीं छोड़ रहे हैं...और जिस दृश्य का आपने ज़िक्र किया, वो यहाँ अब कम होते जा रहे हैं...
    ऐसा क्यूँ है, जो ग़लत चीज़ें पश्चिम छोड़ने लगता है पूरब अपनाने लगता है ?

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    1. जो जगह हमने देखी ही नहीं, वहाँ के बारे में जो मर्जी बता दीजिए, हम कौन सा चैलेन्ज कर सकते हैं? सिगरेट छोड़ दी है पश्चिम वालों ने तो कुछ और शुरू कर दिया होगा, हैं तो खराब ही सारे के सारे:)

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    2. एकरा में कौनो सक नईखे...
      बुरा जो देखन मैं चली बुरा न मिलया कोई
      जो ब्लॉग जगत ढूँढा आपना तुझसा बुरा न कोई..
      खल कुटिल कामी :):)

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    3. मो सम कौन कहे नहीं लिखा ?

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  3. Ada ji , aaj sab abhutpoorva jo banna chahate hain. Aur Sanjay ji jaise Mastron ki desh ko ghanghor zarurat hai.

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    1. बाई गोड अविनाश जी, मास्टरी मेरा one of the dream carriers था| बन नहीं पाया :(
      कित्ता मजा आता, कि स्कूल से लौटता तो एकदम फ्रेश होकर| सारा गुस्सा बालकों पर निकाल चुका होता:)

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    2. अविनाश जी,
      इनको तो हम इनकी एक पोस्ट पर 'घनघोर वाईस चांसलर' की पदवी दे चुके हैं..:)

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    3. आप पदवी देने का अधिकार रखती हैं| उच्च पायदान पर स्थित लोग प्रोत्साहन देने के लिए पदवी, पुरस्कार देते ही हैं:)

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  4. एक आधुनिक वैताल कथा -क्या वैताल को विक्रम मिल भी पायेगा ?

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    1. वैताल को नए नए विक्रम मिल ही जाते हैं अरविन्द जी| कम से कम हिन्दुस्तान में बनने वालों की कमी नहीं है, बनाने वाला चाहिए|

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  5. पीक ओवर्स या पीक ऑवर्स... दोनों में रात दिन का फर्क आ जाएगा।

    छिपकली के बाद आपके दूसरा रूपक देख रहा हूं "कबूतरी बिलाव पर"

    कुल मिलाकर शानदार... फेसबुक पर मैंने एक शंका के जरिए इस कोण को देखने का प्रयास किया, लोग बुरी तरह भावुक हो गए... :)

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    1. शुक्रिया सिद्धार्थ जी, सुधार कर दिया है|
      अरे बाबा, आप क्या कम गंभीर पाठक हैं? अतीत में झाँक रहे है:)
      भावुकता तो हम लोगों की बस यूं बरसने को तैयार रहती है कि बादल भी शर्मा जाते होंगे|

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    2. 'शरमा'

      दर असल मुझे बराहा की आदत है और वो अब काम नहीं कर रहा, इसलिए टंकण की गल्तियाँ कुछ ज्यादा ही हो जाती हैं:(

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    3. हा हा हा हा...

      मैंने कभी बराहा काम में नहीं लिया, इंडिक आईएमई ही इस्‍तेमाल करता हूं, इसलिए मदद की गुंजाइश भी नहीं है... :)

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    4. गुजाईश वाली मदद हम मांगते ही नहीं सिद्धार्थ जी:)

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    5. कहीं आँगन ठेढ़ा....:):)

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    1. फिलहाल तो बच ही गया जी, आगे जो होगा वो देखी जायेगी:)

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  7. विक्रम तो अब भागा भागा ही फिरेगा.

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    1. मारा-मारा भागा-भागा, बेचारा विक्रम..

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  8. पश्चिम का सारा कचरा पूर्व में हो तो भेजा जा रहा है , वह चाहे इलेक्ट्रोनिक या सांस्कृतिक!

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    1. इम्पोर्टेड की एक समय में बहुत कदर थी वाणी जी, आज भी है| कई बार तो बाद में पता चलता थी कि इंडिया से ही गया था सामान| कम हम पूरब वाले भी भी नहीं हैं, जितने मर्जी क्वालिटी checks हों, हम भी गुंजाईश निकाल ही लेते हैं|

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    1. यहां लाइक का ऑप्‍शन नहीं है, अभिषेकजी, वरना करके निकल जाता... :)

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    2. ए भाई लोग, तारीफ़ कर रहे हो या खीच रहे हो आप लोग भी? :)

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  10. मेट्रो में जिन्दगी भाग रही है और मनचले उसे लखेद रहे हैं।

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    1. जी प्रवीण जी, और दुष्परिणाम किसी एक पक्ष के हिस्से में ज्यादा आता है|

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  11. एक कबूतरी लहक लहक कर बिलाव पर कुर्बान होती दिख रही थी|

    कबूतरी ये सही कहा , क्युकी कबूतरी बड़ी चौकस रहती हैं गर्दन सब तरफ घुमती हैं
    pda अब एक आम बात होती जा रही हैं कारण बहुत से हैं केवल और केवल पश्चिम की सभ्यता की कॉपी ही कारण नहीं हैं

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    1. बिल्ली\बिलाव शायद कबूतर\कबूतरी से भी ज्यादा चौकस रहता\रहती है|

      सभ्यता वाली बात से सहमत. कोई एक कारण खुद में पर्याप्त नहीं है|

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  12. और इससे बड़ी भ्रान्ति क़ोई हैं नहीं जब हम कहते हैं की पूरब पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हैं या जो वहाँ छुट चुका हैं यहाँ अपनाया जाता हैं
    हम "पिछड़े" कभी थे नहीं हमारे यहाँ हुक्का , सिगरेट , शराब का सेवन तो रानी , महरानी और आम नारी पुरातन काल में भी करती थी .
    आज भी गाँव देहात में औरते इसका सेवन करती दिखती हैं { अदा जी इसको मेरा असहमत होना नहीं मेरा नजरिया समझे } , हमारे घर में मैने खुद देखा हैं
    माँ की काम करने वाली "अम्मा" , माँ का मुसलमान "ड्राइवर " और माँ का गुजराती "कुक " दोपहर में एक साथ एक जगह बैठ कर एक ही बीड़ी से काश लगाते हैं . अम्मा की उम्र ५५ साल थी , ड्राइवर २५ और कुक शायद २० साल का था उस समय .
    मेरे लिये वो दिन "आँख खुलने "जैसा था क्युकी उस दिन समझ आया था की हमारे यहाँ सब होता हैं लेकिन सामने नहीं

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    1. @ आपकी बात सही है, मैंने भी अपने घर में ये देखा है, लेकिन ये शुरू से हमारे समाज में था या ये अंग्रेजों ने दिया हमारे समाज को, या मुगलों ने ये मैं नहीं जानती...
      मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ़ इतना है, की जब यहाँ बेलबाटम छूट गया तो, पूरब ने अपना लिया, फैशन हो या जीवन जीने का अंदाज़, पश्चिम में जब लोगों की आँख खुलती है, उन्हें महसूस होता है, ये सही नहीं है, वो छोड़ देते हैं, और पूरब वाले उसी छोड़ी हुई चीज़ को बिना कुछ सोचे हुए अनुकरण पर लेते हैं...
      अब यहाँ बच्चे. घर छोड़ कर नहीं जाते, क्योंकि बच्चों को आटे-दाल का भाव समझ में आ गया है...अब अधिकतर बच्चे अपने माँ-बाप से साथ, बड़ी उम्र होने पर भी रहने लगे हैं...लेकिन भारत में अब इस तरह की बातें शुरू हो गईं हैं...
      इतना ही क्यूँ यहाँ वाले अपनी सुविधा के लिए जो भी करते हैं, हम उसकी नक़ल करने में एक पल भी नहीं लगाते, फिर चाहे वो मॉल की संस्कृति हो या मकडोनाल्ड की...वेस्टर्न संस्कृति से आख़िर इतना अनुराग क्यों ? क्यों हमें हमारी अपनी भाषा या संस्कृति दोयम दर्जे की नज़र आती है ? भारत में प्रबुद्ध लोगों की कमी नहीं है, लेकिन सफल वही होते हैं जो अंग्रेजियत में लपेट कर ख़ुद को पेश करते हैं...आख़िर अपने भारतीयता के प्रति ये हीन भावना क्यों ?

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    2. @हम "पिछड़े" कभी थे नहीं हमारे यहाँ हुक्का , सिगरेट , शराब का सेवन तो रानी , महरानी और आम नारी पुरातन काल में भी करती थी .

      रचना जी,
      'पुरातन काल' नहीं, यह सब मध्यकाल के बर्बर युग की थाती है. पुरातन काल में मद्य मदिरा प्रचलित अवश्य था लेकिन तब भी वह लम्पट व दुराचारियों का शौक था.सभ्य सुसंस्कृत जन मेँ तो हेय ही माना जाता था.

      इसमेँ कोई भ्राँति नहीँ कि बर्बर जँगली पश्चिमी सभ्यताएँ तो सुसंस्कृति की ओर बढती रही उसी क्रम मेँ वे कदाचार त्यागती रही, सुविधामोही हमारे लोगो ने बिना जाँचे परखे उनके तजनीय आचार अपना लिए.

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    3. मेरे लिये वो दिन "आँख खुलने "जैसा था क्युकी उस दिन समझ आया था की हमारे यहाँ सब होता हैं लेकिन सामने नहीं

      merae kamaent ki aakhri laain aap dono miss kargaey haen

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    4. आख़िर अपने भारतीयता के प्रति ये हीन भावना क्यों ?



      दिस्क्लैमेर इस कमेन्ट को व्यक्तिगत नहीं लेना हैं अदा आप को , ये महज संवाद को आगे लेजाने के लिये हैं
      अदा जी
      भारतीयता के प्रति हीन भावना किसी में नहीं हैं लेकिन जब भारत में बसा क़ोई बाहर से आये भारतीये यानी विदेश में नौकरी कर रहे व्यक्ति को देखता हैं , उसके पास हर सुख सुविधा को देखता हैं , उसकी तनखा को देखता हैं तो सोचता हैं की इनकी तो एश हैं , हम भी वही होते , कमाते , और मज़े में रहते . बस इंग्लिश बोलनी बढ़िया आनी चाहिये .
      जो भारतीये बाहर बसे हैं क्यूँ , आप कहेगी मज़बूरी हैं , यहाँ काम नहीं मिला वहाँ जाना पडा , अब वही बस गए इत्यादि इत्यादि . आप को भारत से प्यार हैं पर उन सुविधाओ को आप छोड़ कर अब भारत में नहीं रह सकती बहुत मुश्किल होता एक बार सुविधा में रहने के बाद छोड़ना . यानी आप भारतीयता चाहती हैं पर अपनी शर्तो पर दूसरो के लिये . आप चाहती हैं भारत में रहने वाले यहाँ की अच्छी बातो को समझे क्युकी आप उन अच्छी बातो को वहाँ मिस करती हैं लेकिन आप की सुविधा , आप की इंग्लिश , आप का रहनसहन का तरिका उनको भी वही जाने को आकर्षित करता हैं जहा आप हैं क्युकी आप उनके लिये "तरक्की , सहूलियत और फॉरवर्ड " की मिसाल हैं .
      इस लिये वो भारत में रह कर भी विदेशी रहन सहन को कॉपी करता हैं
      और इस मै क़ोई बुरी बात मुझे इस लिये नहीं दिखती क्युकी आप लोग खुद मानते हैं की पूरब की बाते आज कल पश्चिम में कॉपी की जाती यानी वो भी "विदेशी रहन सहन " को ही कॉपी कर रहे हैं .
      भारतीय , हिंदी इस सब से जिन्हे सच्चा प्रेम हैं वो जहां भी रहे , जिस परिधान में भी रहे , जिस भाषा को भी बोले भारत का होने का गर्व उनके सर माथे को ऊँचा रखता हैं
      जो कल था आज नहीं हैं , जो आज हैं कल फिर बदलेगा पर इस को ये कहना की जो बदले समय में रह रहे हैं वो भारतीये होने पर गर्वित नहीं हैं गलत हैं .

      और अपनी कहूँ तो विदेश में नौकरी मिलने के बावजूद नहीं गयी अपने ही देश में रह कर उनलोग के साथ काम करती हूँ जिन्हे हथकरघा चलाने वाला कहा जाता हैं , डॉलर में कमाती हूँ , कुछ कम सही , उसके लिये अपनी जरुरत कम करदी हैं अपनी आकांक्षा और महत्वाकांक्षा में अंतर कर लिया हैं
      महत्वाकांक्षी होती तो १९९२ में विदेश में जा कर बस गयी होती और अपने भारतीये होने पर फक्र करती अब यही रहकर करती हूँ और वहाँ की अच्छी बातो को अपने जीवन में उतार रखा है
      अगर पश्चिम में सब कुछ बुरा होता और भारत में अच्छा तो शायद ही क़ोई भारतीये वहाँ रह पता

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    5. सबसे पहले आपने हथकरघा जैसी विलुप्त होने जा रहे उद्योग को एक पहचान दिलवाई है, उसके लिए आपको नमन...आपने सचमुच बहुत बड़ा काम कर रहीं हैं...अब आपकी बातों तो थोड़ा विस्तार मैं भी दे दूँ...
      व्यक्तिगत रूप से हमारे परिवार के साथ नौकरी न मिलने जैसी कोई बात नहीं थी..मैं क्लास वन ऑफिसर थी इग्नू में और मेरे पति भी क्लास वन ऑफिसर थे...लेकिन हम लोग वहीं रुकने वालों में से शायद नहीं थे...चाहते तो अपनी-अपनी सरकारी नौकरियों से बहुत संतुष्ट रह सकते थे...रोज़ ऑफिस जाते और अपनी कुर्सियों में बैठ कर बिना ज्यादा काम किये हुए तनखा उठाया करते...रिटायर हो जाते और अच्छी-ख़ासी पेंशन पाते...लेकिन शायद हमें वो मंजूर नहीं हुआ...भारत में जितना हमें मिला, क्या हम इस काबिल हैं कि यही सबकुछ हम विदेशियों के साथ रह कर कर सकते हैं...? यही भावना हमें विदेश ले आई...आज मन में एक बहुत बड़ी संतुष्टि है, कि हम इनसे कहीं से भी कम नहीं हैं, बल्कि कई मामलों में हम इनसे बहुत आगे हैं...हमारे जैसे लाखों भारतीय हैं जो विदेशों में बहुत ऊंचे मकामों पर हैं...ये भारतीय अगर भारत में रहते तो शायद वो मक़ाम नहीं हासिल कर पाते...किसी भी बड़ी कंपनी का प्रोफाइल उठा कर देखा जा सकता है, आज बड़े से बड़े पद पर कोई न कोई भारतीय है...ये भारतीय न सिर्फ़ व्यक्तिगत रूप से समृद्ध हैं बल्कि इन्होने दुनिया को अपनी बुद्धिमता और पौरुष से समृद्ध किया है और भारत का नाम आसमान तक पहुंचाया है...फिर वो IBM , Microsoft, Google, Pepsi, NASA, CITIBANK, MITTAL या और हज़ारों कम्पनियाँ हों, इतना ही नहीं जो छोटे काम भी कर रहे हैं यहाँ आकर, भारतीयता को विस्तार देने में उनका बहुत बड़ा हाथ है, इनके कारण आज भारतीय संस्कृति, भाषा, खान-पान, परिधान, शिष्टाचार को, विदेशों में और भी ज्यादा पहचान मिल रही है...क्योंकि भारतीयता भारत से निकल कर विदेशियों के घरों तक पहुँच रही है...
      बहुत छोटी सी बात है, मेरे बच्चों के दोस्त अपने घरों में अपने माँ-पिता के सामने बैठे ही रहते थे, लेकिन जब वो बच्चे मेरे घर आते हैं और देखते हैं कि मेरे बच्चे अपने माँ-बाप के, सामने आते ही उठ जाते हैं, उनको बैठने को कुर्सी देते हैं, उन्होंने ने भी अपने घरों में ऐसा ही करना शुरू कर दिया...इस सुखद बदलाव को कनाडियन माता-पिता ने अपने बच्चों में देखा और मुझसे शेयर भी किया...मेरे बच्चों के दोस्तों के माता-पिता हमेशा चाहते हैं कि उनके बच्चे मेरे बच्चों के साथ रहें, क्योंकि उन्होंने अपने बच्चों में बहुत सारे अच्छे बदलाव देखे हैं...
      मेरे घर में जब भी पूजा होती है बच्चों के गोरे दोस्त आते हैं और बहुत ख़ुश होकर उसमें हिस्सा लेते हैं...मन्त्रों का अंग्रेजी में अनुवाद सुनते हैं, जो कहीं न कहीं उनपर अच्छा प्रभाव डालता है...यह सब भारतीयता को विस्तार ही दे रहा है...हम अपने छोटे से तरीके से ही सही, भारत और भारतीयता को विदेश पहुँचा रहे हैं...जो शायद वहाँ रह कर हम नहीं कर पाते...
      आज यहाँ के डॉक्टर्स भारतीय भोजन, रोगियों को प्रेस्क्राइब कर रहे हैं, क्योंकि वो भी मानते हैं, भारतीय भोजन सबसे संतुलित भोजन है, उनके ऐसा करने से भारतीय भोजन को विस्तार मिल रहा है, भारतीय परिधान में साड़ी से खूबसूरत और गरिमामय परिधान दुनिया में दूसरा नहीं है, यह विदेशी भी बिना संकोच मानते हैं...लेकिन हम भारतीय उसे नहीं पहचानते...

      जहाँ तक सुविधाओं का प्रश्न है, वो हमें इसलिए मिलता है क्योंकि इन देशों कि सरकार ईमानदारी से टैक्स पेयर्स के पैसों को खर्च करती है....भारत में अगर मंत्रीगण इतना घपला न करें तो सुविधायें यहाँ से दस गुनी ज्यादा हो सकतीं हैं, क्योंकि आबादी के अनुपात में ही टैक्स के पैसे आते होंगे, और वो यहाँ से कई गुणा ज्यादा होगा...सारी बातें आकर रुकतीं हैं ईमानदारी पर...अगर हर भारतीय बस इस गुण को अपना ले, तो भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता...हमारे पास समृद्ध संस्कृति, सभ्यता पहले से ही है, बस ज़रुरत है उसे बचाए रखने की...

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    6. लेकिन हम लोग वहीं रुकने वालों में से शायद नहीं थे...चाहते तो अपनी-अपनी सरकारी नौकरियों से बहुत संतुष्ट रह सकते थे...रोज़ ऑफिस जाते और अपनी कुर्सियों में बैठ कर बिना ज्यादा काम किये हुए तनखा उठाया करते...रिटायर हो जाते और अच्छी-ख़ासी पेंशन पाते...लेकिन शायद हमें वो मंजूर नहीं हुआ...भारत में जितना हमें मिला, क्या हम इस काबिल हैं कि यही सबकुछ हम विदेशियों के साथ रह कर कर सकते हैं...?

      ab daekhiyae aapne khud hi keh diyaa ham rukane waalo me nahin they
      aur bhartat me reh kar santusht ham nahin ho saktae they

      aap jahana haen wahaan apni sanskriti sae judii haen is liyae yae kament naa diyaa karae ki bharat me rehnae waalae bhartiyataa bhul chukae haen kyuki jo bharat me haen wo koi "rukaa nahin haen " sab aagae jaa rahey aapni sanskriti aur sabhytaa ko saath hi laekar

      baadlaav haen pehlae bhi they ab bhi haen

      aap ne sochaa yahaan ruk kar kyaa hogaa
      maenae socha yahaan ruk kar bhi sab kuchh ho saktaa haen
      aur jo nahin hogaa USKO MAE THEEK KARUNGI BADLUNGI AUR BEHTAR BANATUNGI taaki kewal mae maeraa parivaar nahin mare saath kae aur log bhi aagaey jaayae , wo bhi samjhae ki videsh mae kamanae sae behtar yahaan utni hi mehnat karna aur kamanaa haen

      is allawa kyuki aap log kam yahaan aap paatae honage is liyae aap logo ko yahaan badlaav jayadaa mehsoos hotaa hoga shaayd issivajah sae aap ko lagtaa haen ki hamae yaahaan bharityataa par fakr nahin haen

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    7. रचना जी,
      अपना-अपना तरीका होता है काम करने का.. मुझे ग़ैरों के बीच में रह कर अपनी बात कहना ज्यादा चैलेंगिंग लगा, और मैंने उसी हिसाब से अपना काम किया...मुझे अपने फैसले पर नाज़ है...बाक़ी अगर सबकुछ वहाँ ठीक चल रहा है, जैसा की आप कह रहीं हैं फिर तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ?
      जहाँ तक पैसों का सवाल है, मुझे तनखा मेरे बाबा से ज्यादा मिलती थी, जबकि मेरी उम्र बहुत कम थी और ऐसी दो तन्खायें आएँ घर में, तो कम नहीं होता भारत में...पैसों की वजह से कोई काम आज तक नहीं किया है...पैसा कमाना मेरा मकसद कभी नहीं रहा....लेकिन आज भी बैंक में जब मेरी सैलरी स्लिप जाती है, तो बैंक वाले भी एक बार को पूछ ही लेते हैं, Is this your salary ?

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    8. रचना जी, अदाजी , सुज्ञ जी-
      न किसी एक चीज को दोष देने से काम चलने वाला है, न किसी एक चीज पर गर्व करने से| अगर हमें विवेक जैसी चीज मिली है तो हमें उसका इस्तेमाल करते हुए गुण-दोष, उपलब्धता-अनुपलब्धता के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहियें| परिस्थितयां सबकी एक सी नहीं होती, उन परिस्थितों से मुकाबला करने की एप्रोच सबकी एक जैसी नहीं होती, तरीके सबके एक जैसे नहीं हो सकते| मुझे तो यही सबसे ठीक लगता है कि हम स्वयं अपने अपने स्तर से सुधार की कोशिश करें और धीरे धीरे ही सही अपनी क्षमताएं विकसित करें| दिक्कत तभी ज्यादा होती है जब हम किसी के मुकाम या पोजीशन को देखते हैं लेकिन उसके पीछे उसकी लगन और मेहनत को नजरअंदाज करते हुए शोर्टकट अपनाते हैं| इसे उथलापन भी कह सकते हैं, जल्दबाजी भी, नादानी भी और मेहनत से बचने की मानसिकता भी|
      आप सबका व्यक्तिगत रूप से आभार कि इस बहाने हम एक दुसरे के विचारों से अवगत हो रहे हैं|

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  13. इस मामले में मै भी रुढ़िवादी हूँ, प्रेम में हमारा पूर विश्वास है किन्तु ये आज कल का बस यु ही टाइम पास वाला किस्सा हमें भी पसंद नहीं है | "ज्यादातर" मामलों में वही होता है जो आप ने दिखाया है भोली सी कबूतरी और शिकारी वाला , पिछली पोस्ट में आप ने कहा था लच्छेदार बाते बिल्कुल सही कहा था पता नहीं लड़किया और महिलाए इस भोलेपन ( मुर्खता बेफकुफी , गदहापना ) कब छोड़ेंगी , सेंटी बनिए मेंटल क्यों बन जाती है | एक बड़ी आम सी बात कई जगह देखा , पढ़ा और सुना है यदि मैंने "वो" नही किया तो वो मुझे डम, गावर कहेगा और कहता है मुझे छोड़ कर किसी और के पास चला जायेगा , पर इन्हें समझाए कौन की प्रेम के रिश्ते भावनाओ से बनते है सौदेबाजी से नहीं, प्रेम में समर्पण को ये युवा / युवतिया बड़े हलके में लेकर कुछ और ही मतलब निकाल लेते/लेती है |
    वैसे बाजार भी इस बात को समझ रहा है और अपने अंदाज में समझा भी रहा है , जब लड़की लडके के अपने पर हाथ रखने को झटक देती है और कहती है " जवान हूँ नादान नहीं " ऐसे दो चार और विज्ञापन है युवाओ को समझदारी का पाठ पढ़ाते | देखते है की युवा इन्हें कितने गौर से देख रहे है |

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    1. @ आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ, प्यार, प्रेम, प्रीत इससे मुझे भी इनकार नहीं है, लेकिन इसके लिए कोई भी गधा प्यार की बाईस्कोप दिखा कर, लड़कियों को उल्लू बना जाता है, लडकियाँ वाकई सेंटी और मेंटल दोनों होतीं हैं प्यार के मामले मैं...कब सुधरेंगी ये..?

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    2. प्रेम या फेटल अट्रेक्शन जब तक इस बात की समझ आती हैं बहुत नुक्सान हो चुका होता हैं
      बाई द वे
      लड़की को उल्लू कैसे बनाया जा सकता हैं सरासर गलत बात हैं अब संजय ने कबूतर नहीं लिखा कबूतरी लिखा हैं :)

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    3. वैसे उल्लू का स्त्रीलिंग क्या होता है :))

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    4. ऊल्लूवाईन :):)

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    5. समझदार होना ही माँगता है, ये क्या कि कोई किसी को यूं ही उल्लू या उल्लूवाईन बना दे, हाँ नहीं तो...!! :)

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    6. अदा जी ऊल्लू को वाईन पिलाने से वो स्त्रीलिंग कैसे बना कहीं ऐसा तो नहीं ऊल्लू शब्द को ध्यान में रख कर ही ब्लोगर शब्द बना हो
      क्युकी वहाँ भी स्त्रीलिंग नहीं हैं :)

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    7. डिस्क्लेमर सविनय अनुरोध है... कृपया इस तुकबंदी को हास्य में ही लीजियेगा....
      बुझाता है आप सही कह रहीं हैं...ब्लोगर और उल्लू में लिंग भेद नज़र नहीं आ रहा है...
      ऐसा तो नहीं कि सभी ब्लोगर उल्लू होते हैं, इसलिए ऐसा हो :):)
      गधा = गधी
      घोडा=घोड़ी
      चिड़ा=चिड़ी
      ऊल्लू=उल्ली
      हमरे लिए तो बात ई हुई कि 'उल्ली' उतनी पावरफुल नहीं लगी, इसलिए वाईन लगा कर, पावरफुल कर दिया....:):)

      महिला ब्लोगर को, सभी ब्लागर भी कहते हैं

      और महिला टीचर को, सभी टीचर ही कहते हैं

      पंडित जी हमेशा ही, पंडित जी कहाते हैं

      मगर महिला पंडित को, पंडिता ही कहते हैं

      और महिला पंडित को, पंडितानी भी कहते हैं

      पंडित जी की पत्नी तो, पंडिताइन कहाती हैं

      महिला डाक्टर को सभी, डाक्टर ही कहते हैं

      पुलिंग आचार्य शब्द का, आचार्य ही होता है

      स्त्रीलिंग आचार्य शब्द का, आचार्या कहाता है

      मगर आचार्य की पत्नी को, आचार्याणी ही कहते हैं

      बाक़ी टीचर की पत्नी को टीचराईन भी कहते हैं

      और डाक्टर की पत्नी को डाक्टरनी भी कहते हैं

      अब मैं सोच रही तब से, के उनका नाम क्या होगा

      पति जिनके हैं ब्लॉगगर, पत्नी क्या कहाएगी ???

      महिला ब्लॉगगर के पति भी, क्या कोई नाम पायेंगे ????

      पुरुष मास्टर जो हो तो, सभी मास्टर ही कहते हैं

      मगर महिला अगर हो तो, क्या 'मास्टर' कहाएगी

      लेकिन महिला हो तो उन्हें, मिस्ट्रेस भी कहते हैं ???

      मगर मिस्ट्रेस तो भईया 'किसी और' को भी कहते हैं ??

      और दूसरा प्रश्न उठता है, महिला 'मास्टर ऑफ़ साइंस' है

      तो क्या वो 'मिस्ट्रेस ऑफ़ साइंस' कहलाएगी ??

      बड़ी मुश्किल घड़ी है ये, ज़रा निदान कर दीजिये

      मेरे कुछ प्रश्न हैं ये, इनका समाधान कर दीजिये

      कुछ और भी शब्द हैं, जो मुझको डराते हैं

      सभापति, राष्ट्रपति जैसे शब्द, मेरे मन में आते हैं
      इन शब्दों के स्त्रीलिंग, बताइये क्या कहाते हैं

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    8. क्या ज़माना आगया हैं
      तेरा मेरा डिस्क्लेमर छा गया हैं
      ऊल्लू की पत्नी हैन कहलाती हैं
      और हैन का पति मुर्गा होता है
      मुर्गे की पत्नी मुर्गी होती है
      सभा का पति क़ोई कैसे बन जाता है ?
      सभा में तो खुद बहुतो के पति आते है
      राष्ट्र , क्या ये स्त्रीलिंग है
      तो फिर इसका भी पति कहा से आया
      कहीं ना कहीं किसी पति ने ही
      लगता है शब्दों का इतिहास बनाया
      और अपने को हर जगह सबका पति बताया
      इसलिये कुछ शब्दों का स्त्रीलिंग
      कभी नहीं बन पाया

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    9. ha ha ha..
      zabardast...!!
      I rest my case :)

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  14. मुझे लगता है ये पश्चिम और पूरब वाली बात नहीं है हर समाज समय के साथ विकास करता है आगे बढ़ता है तो सभी एक ही चक्र में आगे बढ़ते है उस चक्र को सभी को पुरा करना पड़ता है या किया जाता है कोई कितना भी समझाये की ये कार्य गलत है किन्तु चक्र के उस पायदान पर आने वाला कभी उसे करने से रुकता नहीं है क्योकि हम सभी यहाँ अपने नीजि अनुभवों से ही कुछ सीखने में विश्वास करते है किसी और के कहने पर नहीं , वहा के लोग प्रेम के इस रूप को कर के उब चुके है सो संभव है वो उसे त्याग रहे है यहाँ वाले भी एक दिन इसे करके और इसके झूठ को समझ कर उब कर त्याग देंगे तब तक तो हमें इंतजार करना होगा | यदि कोई ये चाहे की बल पूर्वक या किसी अन्य तरीके से मोरल पुलिसिंग करके इसे रोक लेगा तो वो गलत है याद रखिये युवा वही करता है जिस बात के लिए उसे कड़ाई से मना किया जाये | इसलिए फिजूल की मोरल पुलिसिंग की जगह कुछ और उपाय अपनाने पड़ेंगे और उपाय भी इस बात का ध्यान में रख कर की युवा इस चक्र के किस जगह पहुँच गया है , मेरे समझ से तो काफी आगे है ये सब पापा है गलत है वाली बातो को समझने से काफी आगे जा चुके है इसलिए उनकी हा में थोड़ी हा मिला कर उन्हें पहले "समझदार" ( संभव है की जो मै कहना चाह रही हूं वो आप समझ रहे है ) और उसके बाद संस्कार की बात की जाये |

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    1. विकास चक्र अगर शाश्वत है, अटूट है उसके हर पायदान को पुरा करना ही पड़ता है। पूर्व अनुभवजन्य ज्ञान से समृद्ध नहीं होना और अपने नीजि प्रायोगिक अनुभवों के बाद ही गति करना है जो उन बातो को समझने से काफी आगे जा चुके है। उन्हें "समझदार" बनाने के लिए क्या बचता है? और इस स्थिति परिस्थिति के बाद संस्कार की क्या बात की जाये?

      किन्तु जहाँ तक मैं समझता हूँ, संस्कृति, संस्कार, जीवन-मूल्य के विकास मॉडल के भारतीय सन्दर्भ से बात की जाय तो संस्कृति विकास चक्र उल्टा गतिमान है। वह शीर्ष से पतनगामी होकर पुनः उधर्वमुखी होने के प्रयास में है। लेकिन जिस संस्कृति के ज्ञान भंडार में उच्च कक्षा का ज्ञान उपलब्ध हो उन्हें प्राथमिक स्तर का फोर्सफुल्ली पालन जरूरी नहीं।

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    2. सुज्ञ जी
      हम ही कई बार कहते है की बच्चे को चिंगारी के पास जाने दो जब जलेगा तो खुद ही सीखेगा, जब गिरेगा तो खुद ही चलना सीखेगा , तो बाद में युवा जब इसी बात को दोहराते है तो हमें बुरा लगता है , मानिये या ना मानिये हम सब अपने ही अनुभवों से सिखते है यदि दूसरो के कहने मात्र से समझते तो आज आप हमारी और हम आप की भाषा में बोल रहे होते क्योकि इन 2 सालो में हम एक दूसरे की बात समझ चुके होते :)) |
      " समझदार " इस बात से की वो दोनों कम से कम कुछ बीमारियों से बच सके और लड़किया ..........से बच सके ,

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    3. लाखों टन इतिहास और साहित्य लिखा जाता है दर्शन ग्रंथ लिखे जाते है पता है उसमें क्या क्या होता है, पूर्वगामीओं के 'अनुभव' क्यों होते है तो इसलिए कि इस ज्ञान के बल पर अगली पीढ़ी अनावश्यक श्रम से बची रहे। विज्ञान के ढेरों सिद्धांत संग्रहित कर दिये जाते है, पढ़ाए जाते है। ग्रेविटी के पुनः अनुभव से गुजरने के लिए सभी गिरते सेव का प्रयोग नहीं करते।
      @जब गिरेगा तो खुद ही चलना सीखेगा
      सही बात है, किन्तु इन अनुभवों की अनुमति तभी देते है जब बडी हानि की सम्भावनाएं न्यूनत्तम हो। कोई भी पहाड की चोटी पर यह प्रयोग नहीं करेगा।
      यदि कहने पढ़ने मात्र से न सीखते तो हमारा ज्ञान-विकास आज जहाँ है कभी न होता।

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    4. कहने का तात्पर्य यही है कि जब लाखों वर्षों के अनुभव-ज्ञान का निचोड़ सहज प्राप्य है तो क्यों अतिकष्टप्रद और जोखिम भरे अनुभवों से गुजरा जाय? यह भी सच है कि प्रत्येक कार्य की जिज्ञासा और करने का रोमांच भी मानवीय स्वभाव का हिस्सा है तथापि कईं दुष्परिणामी खतरों से पर-अनुभव के आधार से बचा जाना चाहिए।

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    5. सारी दुनिया पर मोरल पुलिसिंग के हम भी कायल नहीं, लेकिन इसी उदारता के चलते अपने बच्चों, आश्रितों को अपने अनुभव से अवगत न कराएं कि खुद सीखें और जानें तो ये अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराना लगता है| बात वही है कि कोई एक thumb rule सब पर थोपा नहीं जा सकता, अलग अलग परिस्थितियों में तदनुसार व्यवहार करना ही समझ आता है|

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  15. अच्छा है विक्रम नें सटीकता से बेताल की 'फटीक' मानसिकता परख ली।

    'पौरूष' पर डबल दबाव था तब तक विक्रम नें सह लिया और बुद्धिमत्ता से बोध देता रहा।

    अब सहायता करे तो तूँ अपना पौरूष रहने ही दे!, चुप रहे तो कहाँ गई तेरी मर्दानगी? समझाए तो मोरल पुलिसिंग! और खड्डे में जाने दे तो ध्रतराष्ट्र! आवाज उठाए तो संदेहास्पद, समता सुझाए तो कायर!! मेट्रो (संस्कृति)में घुस जाना ही उसे उपाय प्रतीत हुआ।

    बेताल को तो अब कंधों की वैसे भी जरूरत नहीं, अपना फोड खाएगा और जैसा बोएगा वैसा ही काटेगा न :(

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  16. उत्तर
    1. आपने समय निकालकर पढ़ा, धन्यवाद शिल्पाजी|

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    2. oh my god - u r thanking me ? i thank you for writing it

      मैं लौट आई हूँ, और अब हिंदी भी लिख पा रही हूँ | :) "ह्म्म्म" इसलिए लिखा की इस टोपिक पर लिखने को जो भी है - आप सब लिख ही चुके हैं शायद |

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    3. शिल्पाजी, विचारों से शालीनता से असहमत होते हुए भी आपको कई जगह देखा है, इसलिए आपकी hhmmm की भावना समझ पाया था, थैंक्स उसका ही था| अनुरोध यही है कि कभी असहमति हो तो hhmmm से काम नहीं चलेगा, मुझे डिटेल में बताना होगा|

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    4. अब शिल्पा जी ह्म्म्म कहें...:-)

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    5. hhmmm..... ok archana ji ?

      sanjay ji - this was not "asahmati" - it was just a "hhmmmm...." ...

      i did not have anything constructive to add to the already rich discussion going on. But i wanted to register my presence...

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  17. जिन दो दृश्यों को आपने रूपक में बाँधा है उनमे पर्याप्त असमानता है. पहले में माँ अपनी बिटिया को बाल यौन शोषण से बचने के लिए सजग कर रही है. यहाँ किसी के द्वारा जबरन और इच्छा के खिलाफ गलत तरीके से छूने से बचने को कह जा रहा है. जबकि दुसरे दृश्य में लड़की व्यस्क है और अपनी स्वेच्छा से छू रही है और छूने दे रही है. हो सकता है आप इसे अभद्रता मानें पर यौन शोषण तो किसी भी तरह से नहीं कह सकते इसे.

    आश्चर्य है कि आपको लड़की में तो भोलापन और सादगी दिखाई दे रही है और लड़के में पशुता. ऐसा कुछ करता तो लड़का दीख नहीं रहा है. क्या लड़कियों में भावनाएं नहीं होती ? क्या लड़कियां प्यार नहीं कर सकतीं? क्या युवावस्था में उनका मन नहीं मचल सकता? जो आपको कबूतरी और बिलाव दीख रहे हैं मुझे तो दो लव बर्ड्स दीखते हैं. हो सकता है लड़के ने लड़की को फुसलाया हो पर ऐसा कोई प्रमाण यहाँ नहीं दीख रहा है और न ही हमेशा ऐसा होता है.

    मैं मानता हूँ कि कोई लड़की को यदि ऐसा कोई स्पर्श करे जो उन्हें पसंद न हो तो उन्हें पुरजोर विरोध करना चाहिए पर लड़कियों को भी अपने पसंद के व्यक्ति से प्यार करने का पूरा अधिकार है भावनात्मक और दैहिक दोनों स्तरों पर. हो सकता है इन बातों से मैं किसी को स्त्री विरोधी लग रहा होऊं पर यदि मेरी बात को अच्छे से समझें तो मैं स्त्री के पक्ष में ही कह रहा हूँ.

    और जहाँ तक खुले आम प्रेम प्रदर्शन कि बात है तो मुझे लगता है कि जमाना काफी बदल चूका है अब लड़के- लड़कियां सार्वजनिक स्थलों पर एक दुसरे का हाथ पकड़कर घुमने में वो शर्म महसूस नहीं करते जो शायद पचास साल पहले करते रहे होंगे. यदि यह सब एक सीमा के अंदर हो तो मैं इसे बुरा नहीं मानता. जो लोग हर कहीं नैतिकता कि दुहाई देने लगते हैं उन्हें भी अपनी सोच का दायरा वक़्त के हिसाब से बढ़ाना चाहिए. फिर बजरंग दल और विहिप और शिव सेना आदि तो हैं ही संस्कृति के नाम पर फतवे जारी करने के लिए :)

    आप अक्सर पुराने गाने लगाया करते हैं न, एक बहुत पुराना गीत मुझे अभी याद आ रहा है-
    प्यार कर लिया तो क्या प्यार है खता नहीं
    तेरी मेरी उम्र में किसने ये किया नहीं
    http://youtu.be/cwxaNm79SY4

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    उत्तर
    1. सोमेश मेरे मन की बात कहने के लिये धन्यवाद । "लडके में पशुता" का भाव पढकर मेरा भी मन खटका था लेकिन टिप्पणी नहीं लिखी।

      हटाएं
    2. सोमेश,
      बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर दिखे, सीरियसली पढ़ा, अपने विचार रखे - सबसे पहले तो इसके लिए धन्यवाद|
      क्या जरूरी है कि कुछ कहने के लिए दो संबद्ध या समान परिस्थितियों का ही इन्तजार किया जाए? ऐसे सीन कोई पहली बार नहीं देखे मैंने, उस दिन जो देखा था वो कुछ ज्यादा ही था| मैं ज्यादा डिटेल्स नहीं लिख सकता, मेरी अपनी सीमाएं हैं, लेकिन मुझे अजीब सा लगा|
      सिर्फ स्वेच्छा से छुआ जा रहा है या छूने दिया जा रहा है, इसलिए ये यौन शोषण नहीं हुआ, मैं इससे सहमत नहीं| एक बार सर्दियों में दिन ढलने के बाद कहीं से ट्रेन में आ रहा था और अगले दिन से कोलेज कई दिन के लिए बंद हो रहे थे तो होस्टल में रहने वाले छात्र छात्राओं की भीड़ थी| कुछ स्टेशनों के बाद भीड़ कम हो गई तो एक लड़के ने थोड़ा दूर बैठी एक छात्रा को आवाज लगाकर बुलाया, वो आने में इच्छुक नहीं थी, उसने मना कर दिया और मुंह फेरकर बैठ गई| दो तीन बार आवाज लगाई और वो हर बार सर हिलाकर मना कर देती| इधर इसके दोस्त इसका मजाक उड़ा रहे थे| लड़के ने फिर जोर से नाम लेकर आवाज लगाई, '...., एक बार देख इधर' और जब लड़की ने इधर देखा तो उसने हाथ का मोबाईल ऊपर उठाया| वो शायद मोबाईल नहीं, कोई वशीकरण यन्त्र था, या फिर जैसा तुमने कहा लड़कियों में भावनाएं नहीं होतीं? वो भावनाएं जागृत हो गई होंगी, लड़की खिंची चली आई और दो लव बर्डस स्वेच्छा से व्यस्त हो गए|अगले स्टेशन से चढ़ने वाले यात्रियों को वो स्वैच्छिक वालंटियर्स ही लगे होंगे| और मैं मूढ उस फोन के अंदर कुछ ब्लैकमेल जैसी बात समझ रहा था, how fool of me it was:(
      और ये बात उस इलाके की है, जिसे तथाकथित खाप पंचायतों का गढ़ माना जाता है|
      स्पर्श संबंधी भावनात्मक और दैहिक तौर पर लड़कियों के जिस अधिकार की बात तुम कर रहे हो, वो बहुत महानता की बात है और इसके लिए तुम्हें स्त्री विरोधी कोई नहीं मानेगा\गी, so rest assured. rather you will be seen as a rising star, broad minded and practical and understanding and so on, good luck.
      लड़के में पशुता वाली बात में ज्यादा हैरान होने की बात नहीं है दोस्त, 'खग समझे खग ही की भाषा' कभी कभी पशुता सस्पेक्ट करने के लिए खग होना, चलता है:)
      और अंत में, ये नैतिकता वाली सीमा भी गरीबी वाली रेखा की तरह सबल हाथों में ही है, जहां तक मर्जी उठा दो और जहां तक मर्जी गिरा लो|
      काफी कुछ रह गया अभी, फिर देखते हैं:)
      गाना अच्छा है, समय देने के लिए फिर से धन्यवाद, सोमेश |

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    3. यहाँ मै सोमेश और नीरज के साथ हूँ और अपने पहले कमेन्ट में भी यही कहा था "कबूतरी ये सही कहा , क्युकी कबूतरी बड़ी चौकस रहती हैं गर्दन सब तरफ घुमती हैं" जब दोनों हम उम्र हो तो pda के कई कारण हैं और सबसे बड़ा कारण होता हैं हमारे घरो में लगी पाबंदिया जो अपने बच्चो को यानी विपरीत लिंग को ना तो घरो में मिलने देते हैं और ना ही यौन सम्बंधित विषयों पर उनसे बाते करते हैं

      वो स्वस्थ माहोल जो हम चाहते हैं वो हम कभी अपने से अगली पीढ़ी को नहीं देते , कभी घरो में स्वस्थ बहस नहीं होती हमेशा बच्चो को "मैने कह दिया " सुनना पड़ता हैं . बचपन से विपरीत लिंग के मित्र "नो नो " माने जाते हैं . जिस माहोल में विपरीत लिंग का आकर्षण सबसे ज्यादा होता हैं उसी उम्र में उनको सेक्स education की सबसे ज्यादा आवश्यकता हैं जिसका अभाव हैं .

      pda यानी पब्लिक डिस्प्ले ऑफ़ इमोशन को यौन शोषण से नहीं जोड़ा जा सकता हैं अगर दोनों की उम्र एक जैसी हैं .
      हमारे यहाँ के कानून बड़े अजीब हैं pda की वजह एक पति पत्नी को एक पुलिस वाले ने पकड लिया और उनको अदालत में पेश किया , जज ने कहा ये तो पति पत्नी हैं और पुलिस वाले को डांटा भी . अब पति पत्नी को क्या छुट मिलनी चाहिये ????

      १८ वर्ष से पहले यानी बालिग़ होने से पहले किसी को अगर आप कहीं देखे तो आप भी उसको रोक सकते हैं लेकिन ना रोके क्युकी व्यवस्था आप के साथ नहीं खडी होगी और आप असुरक्षित होंगे .

      १८ वर्ष से नीचे के बच्चे होते हैं और उनको सही गलत का एहसास करवाना अभिभावक का कर्त्तव्य हैं और वो भी एक शिक्षक की भांति ताकि यौन शिक्षित हो हमारे देश के बच्चे .

      १९९१ में पहली बार जर्मनी गयी थी , वहाँ ट्रेन से ६ बजे के बाद वापस आ रही थी उस समय उस ट्रेन में हम बहुत से लोग थे जो दिन भर एक exhibition में खड़े हो कर अपने अपने होटल वापस जा रहे थे , अलग अलग देशो के लोग .
      सब थके थे
      मेरे सामने की सीट पर एक जोड़ा बेठा था , पुरुष ने स्त्री का पैर अपनी गोदी में रखा था और उसको दबा रहा था . उनकी उम्र ६० वर्ष के आस पास होगी :) . कुछ साथ के भारतियों को ये बड़ा अजूबा लग रहा था क्युकी एक पुरुष , स्त्री के पैर दबा रहा था सबके सामने . उस देश में जहां कभी कहा जाता था हमने तो बच्चा होने तक अपने पति/ पत्नी की शक्ल नहीं देखी ये सब अजूबा ही था . कुछ भारतीये मुह दबा कर हस रहे थे और एक ने तो ये भी कहा ...... बूढ़े नू !!! . वही दूसरे देश के लोग इस पर ध्यान भी नहीं दे रहे थे


      बात पशुता की नहीं है बात हैं की उम्र क्या हैं दोनों की अगर पुरुष की उम्र और लड़की की उम्र में फासला बहुत ज्यादा हैं तो कहीं ना कहीं क़ोई वजह हैं शोषण की वो पैसा भी हो सकता , वो ब्लैक मेल भी हो सकता हैं और भी बहुत लेकिन अगर उम्र दोनों की बराबर हैं तो विपरीत लिंग का आकर्षण है और अगर उम्र १८ से कम हैं तो उनको सेक्स और उस से सम्बंधित विषयों और उस के दुखद परिणाम जो बहुदा हमारे समाज में लड़की को ही मिलते हैं पर शिक्षा के बेहद जरुरत हैं

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    4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    5. सोमेश जी,

      लेखक नें प्रतीकों के माध्यम से कथ्य का सुघड़ता से सन्देश दिया है………

      @जिन दो दृश्यों को आपने रूपक में बाँधा है उनमे पर्याप्त असमानता है.

      बाल यौन शोषण और व्यस्क समवय यौन शोषण के बीच तरह का शून्यावकाश रच कर अपनी बात बहुत ही स्पष्टता से कहने का प्रयास किया है। देखिए…… "you have to tell it to your mom." से… "बीच बीच में लड़की घूमकर 'कुछ कहने' लगती थी और लड़के के हाथ उसकी कमर को छोडकार कभी उसकी "गर्दन" पर रेंगने लगते थे" इस अन्तराल में आपको कहीं विवशताएं नहीं झलकती? यही कहने का प्रयास किया गया है कि बाल या अवस्क होती तो मम्मी से मदद लेती किन्तु यहां तो विवशताएं ही व्यस्क है गर्दन शिकारी चुगुल में है। और इन दोनो को उस विज्ञापन वाले "विशाल टीवी सेट के ठीक नीचे" दर्शाया जाना भी यह संकेत देता है कि इन सारी 'सावधानियों की शिक्षा' के उपरांत भी छ्द्म मोहकता के अधीन/विवश हो सकती है।

      @लड़के में पशुता. ऐसा कुछ करता तो लड़का दीख नहीं रहा है.

      पशुता पहली नजर में विक्रम को उसकी आँखो में दृष्टिगोचर होती है, पर वह प्रेमावेग भी हो सकता है इसी को कन्फर्म करवाने के लिए, वेताल उसके नाखूनों और दांतो को देखने की हिदायत करता है तब वह देखता है "लड़के के दांत और नाखून धीरे धीरे बढते जा रहे थे" यह प्रतीक है पशुता के, आक्रमकता के, किसी भावनात्मक जबरदस्ती के। लडकी के दांत और नाखून नहीं बढ़ते और मुड कर देखती है, कुछ कहने का प्रयास करती है। यह संकेत है उसका 'मन नहीं मचला'वह इस कार्य में सम-सहायक नहीं है।

      @जो लोग हर कहीं नैतिकता कि दुहाई देने लगते हैं उन्हें भी अपनी सोच का दायरा वक़्त के हिसाब से बढ़ाना चाहिए.

      सोच का दायरा बढ़ाना क्या लोग तो समस्त दायरा ही भूल कर विक्रम की तरह पलायन करने को विवश है। कोई घटना नहीं घटती तब तक "लव-बर्ड्स" ही है। नैतिकता की दुहाई तो तब उभरती है जब घटना घट जाती है और असमन्जस में घिरे लोग चुप ही रह जाते है तब उन्हें उल्हाने में दी जाती है।

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    6. रचना जी,
      मुद्दा वाकई पोस्ट जितना छोटा नहीं है, वजह और समाधान दोनों ही बहुत विस्तृत हैं| जर्मनी वाली घटना से मिलती जुलती घटनाएं यहाँ भी होने लगी हैं, एक ब्लॉग पर ही एक बंधु ने बताया था कि धर्मपत्नी के थके होने पर उन्होंने पैर दबाने की पेशकश की थी, ये अलग बात है कि बदले में 'धत्तत्त' टाईप कुछ सुनने को मिला था| नाम नहीं बताऊंगा, आप ब्लॉग मामलों में सर्वज्ञप्राय है:)
      अपन इस मामले पर बिलकुल तटस्थ रह सकते हैं, कभी कभी खोपड़ी फिरती है तो इसी बात से कि दुष्परिणाम अधिकतर लड़कियों को ही भुगतने पड़ते हैं|

      सुज्ञ जी,
      इतनी बारीकी में जाकर तो मैंने भी जवाब नहीं दिया था:) यूं भी हम कोई बहुत बड़े लेखक-विचारक नहीं हैं, लोग कभी कभी ज्यादा उम्मीद लगा लेते हैं और ये अच्छा ही हुआ कि सोमेश और नीरज जी ने अपनी स्पष्ट राय दी, जो इस पोस्ट में था लेकिन उतना प्रभावी नहीं दिख रहा होगा, वो आपकी टिप्पणी से गौरवान्वित हुआ है| उलाहनों का तो क्या है, एक पुराना गाना सोनेश के बताए गाने के अलावा भी है, 'ये न होता टॉप कोई दूसरा गम होना था' उलाहनों का और अपना रिश्ता पुराना है:) असमंजस वाली स्थिति बहुधा पलायन या तटस्थता की तरफ ही ले जाती है, ये सच है लेकिन एक और रास्ता भी है, खाप पंचायतों वाला या फिर तालिबानी मानसिकता वाला या जिन्हें तथाकथित संस्कृति रक्षक कहकर कोसा जाता है, उनके वाला|

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    7. संजय जी,
      यह तो समीक्षा विधा पर हाथ आजमाने का विनम्र प्रयास था। सोचा लगे हाथ क्यों न अभ्यास कर लिया जाय :)
      सोमेश जी और नीरज जी के स्पष्ट दृष्टिकोण से ही प्रेरित हुआ कि उन्हें वह सब क्यों नहीं दीखा जो स्पष्ट अभिव्यक्त हुआ है। इस पोस्ट में कोई शब्द-वाक्य मात्र कथन-सूत्र पकडने के उद्देश्य से निर्थक प्रयुक्त नहीं हुआ। कोई वाणी-विलास नहीं, प्रत्येक शब्द अर्थ-समर्थ है। शीर्षक से लेकर अंत तक!! साधारण लगते प्रेमालाप के आलेखन में गुप्त धमकी के सूत्र अंकित हुए है- "बीच बीच में लड़की घूमकर कुछ कहने लगती थी और लड़के के हाथ उसकी कमर को छोडकार कभी उसकी गर्दन पर रेंगने लगते थे" मतलब 'कमर' या फिर 'गर्दन' संदेश स्पष्ट है। कैसी पशुता हमारे अवलोकन में स्पष्ट होगी? गुवहाटी कांड़ की फिलमाई गई पशुता ही?

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    8. लाजवाब रहा पूरा पोस्ट और उसका कमेंट।

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    9. सुज्ञ जी आपने जिस तरह पोस्ट को विस्तार दिया। क्या लिखूं , उपयुक्त शब्द नही है , यहां तो एक एक शब्द की समीक्षा है। वाह एक पाठक को और क्या चाहिए

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  18. भैया जी आपने मेरी बहुत सारी समस्याओं का समाधान कर दिया .राजा विक्रम और वैताल मेरे पसंदीदा किरदार हैं आपके पोस्ट से समाधान का फिर कभी खुलासा मैं आनंदित हुआ
    शानदार से शानदार .मज़ा आ गया ..

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    1. अरे गुरूजी, समाधान का खुलासा तो कर देते| अब रात भर तडपता रहूँगा इस गम में कि हमारी वजह से कोई आनंदित हुआ :)

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  19. कुछ देर तक विक्रम-वेताल को सामान्य दोस्त समझता रहा। पढ़ते-पढ़ते जाना कि ये तो वो वाले हैं।:) शीर्षक 'मेट्रो स्टेशन पर विक्रम-वेताल' होता तो शुरू से ही उसी मूड में पढ़ता। लम्बे-लम्बे कमेंटस् हैं जो अभी नहीं पढ़े।

    'एक कबूतरी लहक लहक कर बिलाव पर कुर्बान होती दिख रही थी|'... यह नया प्रयोग जोरदार है। शेष तो सभ्यता पर करारा तंज है ही। :)

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    1. जोरदार तो क्या है कविवर, जैसा बन पड़ा लिख दिया|

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  20. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    लैट देम एन्जॉय!
    इस फिलम में फत्तू का साईड रोल भी नहीं?
    आशीष
    --
    इन लव विद.......डैथ!!!

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    1. यहाँ बिक्रम बैताल का आपस में रोला रप्पा हो गया है और ये शास्त्रीय गायक जी फत्तू को याद कर रहे हैं, वैरी गुड|

      काये कू दान विद लव भाया? चियर अप|

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    2. सारी सुपरहिट फिल्मों से फत्तू को आउट करना कोई षड्यंत्र तो नहीं? :)

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  21. विक्रम कब तक बचेगा बेचारा, देखते है....

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    1. देखेंगे उपेन्द्र भाई, हम भी ..

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    2. ab tak to bacha hi samjhen?????


      bara tapchik raha ye post.....


      pranam.

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    3. भेलकम नामराशि|
      रापचिक से टाप्चिक? चलेंगा भिड़ू:)

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  22. उत्तर
    1. गोल चपटी तो ठीक है कौशल जी, आपकी जाति भेद वाली पोस्ट पर मेरा कमेन्ट ही पोस्ट नहीं हो पा रहा था, कई बार कोशिश कर चुका| बहुत अच्छी पोस्ट है वो आपकी, ज्ञानवर्धक|

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  23. वाह! आज तो सचमुच मास्टरजी कहे बिना मन न मानेगा! जबरदस्त पंचतंत्र है :)

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    1. विक्रम मूढ़बुद्धि हो गया है क्योंकि वह रात को MTV, FTV, और सप्ताहांत में cocktail नहीं देखता। अगर उसकी अंग्रेज़ी थोड़ी अच्छी होती तो उसे वेताल के साथ दोस्ताना-३ में कास्ट किया जाता।
      उसे न्यूज़ चैनल देखने की फुर्सत भी नहीं है जो 'पीक आवर्स' में नॉएडा वाली मेट्रो में चढ़ा है, उसका अशोकनगर और सेक्टर-१५ के बीच मलीदा बनना तय है।

      किन्तु बिना वेताल को मुक्त किये उसकी मुक्ति असंभव है इसलिए वो बच जाता है, और अगले दिन की पुरजोर फटीक के पश्चात दोनों पुनः वहीँ हैं- वही समय, वही लोग, वही विज्ञापन लेकिन जोड़ा दूसरा है।
      चूँकि मुझे अंग्रेज़ी आती है, मैं कहता हूँ - डेजा वू!
      इस बार भी दाँत और नाखून देख कर वेताल विक्रम को ललकारता है, और विक्रम की biceps फड़क उठतीं हैं।
      विक्रम आगे बढ़ता है, छः फुटा, भरे-पूरे six -packs, रेशमी- कन्धों तक लहराते बाल, स्वर्ण कुंडल-कड़े, स्फटिक-माणिक जड़ित माला, कोई बढ़िया से deo की महक।
      लडकी लड़के के दांतों को झटक देती है, और प्रसन्न वदन विक्रम के साथ मेट्रो में घुस जाती है।
      इस बार भी वेताल और वह लड़का बाप-भाई की गालियाँ दे रहे हैं - केवल विक्रम को।
      इस बीच विक्रम वैशाली निकल चुका है।
      विज्ञापन बदल गया है, प्रियंका चोपड़ा पूछतीं हैं - why should ............?

      मुझसे DTC का ड्राईवर पूछता है, किस वटवृक्ष तले विक्रम को रातोंरात परम ज्ञान प्राप्त हुआ?
      मैं बहुत यत्न करता हूँ पश्चिम को गरियाने का पर स्वयं को असफल पाता हूँ।

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    2. ये कमेन्ट स्पैम में गया होता तो मैं पचा गया होता प्यारे, 'पार्ट टू' में इसे ही पोस्ट कर देता| शिकायत तो चोरियों की पहले ही न की तुमने तो अब क्या करते? आखिर तो हम अपनों में ही हैं| पर हाय, कमेन्ट स्पैम में न गया:)
      प्रियंका करीना .., जैसे देव वैसे इनके भक्त| रोल माडल्स यही अच्छे हैं, क्योंकि यही बिकते, दीखते हैं|
      DTC वाले को बता देना कि अब नैनो क्रेन्स भी आ गई हैं, जहां विक्रम को सुविधा होगी वटवृक्ष को वहीं जड़ों समेत पुनर्रोपित करवा देंगे| उसे प्राप्त करना हो परम ज्ञान तो बुकिंग अमाऊंट जमा करवा दे, early bird rebate भी मिल जाएगा| We deal in all kind of birds these days, be they are love birds or early birds.
      तुम पश्चिम को गरियाने पर खुद को असफल पाते हो, मैं भी| हम तुम अपने दोष ही देखेंगे और वहीं से निवारण भी करेंगे, चिंता नक्को|

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    3. वाह! अविनाश भाई.. गज़ब! कभी-कभी कविताई छोड़ इसी तर्ज पर पोस्ट ठेल दिया करें। आपके व्यंग्य आलेख सुपर हिट होंगे।

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  24. विक्रम वेताल की चोखी ताल मिलाई
    राम राम

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    1. आज आपके वाले 'बाबू साहब' की पोस्ट देखी तो अपनी पोस्ट से बेहतर लगी वो, ताल जबरदस्त है|
      राम राम|

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  25. @असमंजस वाली स्थिति बहुधा पलायन या तटस्थता की तरफ ही ले जाती है,
    हम्म्म्म तभी हमारी टिप्पणियों का कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया :)
    वैसे कोई बड़ी बात नहीं है बस जब पाठक ने खुल कर अपने विचार रखे है तो उसकी उम्मीद होती है की लेखक भी उन पर थोडा खुल कर अपनी राय दे |
    सोमेश जी और अविनाश जी की दो विपरीत टिप्पणियों से भी सहमत हूं इसलिए ही मैंने अपनी टिप्पणी में ज्यादातर को " " के बीच लिखा था क्योकि ये दो पहलू भी है समाज में |

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    1. अपने स्तर पर अपना पक्ष रखने की कोशिश की तो है, ज्यादा खुलेपन के तो हम वैसे ही खिलाफ हैं:)

      फिर से कोशिश करता हूँ - सिर्फ देखादेखी या जोश में आकर या किसी और वजह से दूसरों पर अपनी राय थोपने का, जजमेंटल होने का मैं पक्षधर नहीं हूँ| किसी घटना पर त्वरित प्रतिक्रियाएं देने में हम सब देर नहीं लगाते, कुछ समय बाद पता चलता है कि घटना पूर्वनियोजित थी| उदाहरण के तौर पर गुवाहाटी कान्ड को भी ले सकते हैं और कुछ साल पहले दिल्ली में एक महिला टीचर के साथ हुई घटना को भी| दूध के जले लोग जब किसी घटना की विश्वसनीयता को परखने का प्रयास भी करें तो पता चलता है कि उनपर ही दुराचारियों का समर्थन करने की बात तक उठ खडी होती है|

      दूसरों से बहुत ज्यादा आशा नहीं रखता, न ही ये भ्रम पालता हूँ कि सब बदल जायेंगे| दूसरों को बदलने से ज्यादा आसान और जरूरी विवेक का इस्तेमाल करते हुए खुद को समझना समझाना बेहतर लगता है| होता इससे बिलकुल उलट है|

      व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मैं भी पक्षधर हूँ, लेकिन हमें स्वतंत्रता का सम्मान करना भी आना चाहिए| स्वतंत्रता का मतलब उच्छृंखलता नहीं होता| चिडियाघर में जानवर पिंजरे के अंदर रहता है तो आदमी खुला घूम सकता है,सैंक्चुरी में इसका उलट होता है| अपना समाज भी समाज नहीं है, वाईल्ड लाईफ सैंक्चुरी की तरह है तो सावधान रहना चाहिए, खास तौर पर जिसे ज्यादा दुष्परिणाम झेलने पड़ते हैं उसे तो और भी ज्यादा| स्पष्ट कर दूं कि ये कोई दूसरों के लिए आदेश\निर्देश नहीं जारी कर रहा, मैं अपना नजरिया पेश कर रहा हूँ| एक उदाहरण के जरिये और स्पष्ट अकरने की कोशिश करता हूँ - मैं जीव ह्त्या में यकीन नहीं करता, इसलिए शेर\भेडिये भी मुझे कुछ नहीं कहेंगे, इसे मैं समझदारी नहीं मानता|

      विपरीत सोच, विपरीत टिप्पणियाँ - मैं खुद भी यही मानता हूँ कि एक vibrant समाज में एक ही समय में विभिन्न विचारधाराएं चलती ही हैं| और बहुत बार हम दोनों से एक साथ सहमत या असहमत भी हो सकते हैं|

      आशा है हम्म्म्म अब कुछ नरम होगा:)

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    2. uu kaa kahte hain..!
      LET US AGREE TO DISAGREE :)

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    3. yess, this is tha mantra - let us agree to disagree, thanx a lot for re-iterating my fvrt line.

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    4. You are bhelcome..aur ii rahi hamri taraf se 100th comment..
      Hurrey...! :)

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  26. मारे गये गुलफ़ाम (विक्रम).

    रामराम

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  27. लो जी जितनी बड़ी तो आपकी पोस्‍ट भी नहीं थी,उससे बड़ी उसकी व्‍याख्‍या हो गई। सचमुच आप सम ?
    *
    और मैं भी सोमेश की बात से सहमत हूं। और उनकी बात से भी जिन्‍होंने कहा कि लाख विज्ञापन दिखाओ,चेतावनी लिखो, जिसको जो करना है वे करेंगे, छुपकर या सार्वजनिक रूप से।
    *
    यहां पूरब और पश्चिम की बहस भी चल रही है। भैया पूरब पश्चिम तो यहीं है उसके लिए विदेश जाने की आवश्‍यकता क्‍या है।
    *
    और अदा जी क्षमा करें। वे विदेश में जहां रह रही हैं, वहां भारतीय संस्‍कृति को बढ़ावा दे रही हैं, यह अच्‍छी बात है। लेकिन यहां हिन्‍दुस्‍तान में तो सारा रोना इसी भारतीय संस्‍कृति का है। इसी संस्‍कृति ने हमें वे मूल्‍य दिए हैं जिनके बिना पर बेटी को भी बेटा कहा जाता है। जिनके बिना पर घर में महिला को चुप रहने को कहा जाता है। जिनके बिना पर लड़कियों को कहा जाता है कि सिर झुकाकर या कि नजरें नीची करके चलो। फिर भी लोग कहते हैं कि इस पर गर्व करो।

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    1. राजेश जी,
      धन्यवाद भी और स्वागत भी| कहीं जाना पड रहा है, संस्कृति वाले आपके कथन पर मेरा जवाब लौटकर जरूर दूंगा, कि 'गर्व क्यों किया जाए'

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    2. माफ़ कीजियेगा उत्साही जी,
      आप जिन बातों का ज़िक्र कर रहे हैं, वो हमारी संस्कृति नहीं, संस्कृति के नाम पर थोपी गई मान्यातायें हैं...बेशक इनको महिलाओं पर लादने का बहुत ही अच्छा कारण रहा होगा...जो कालांतर में संस्कृति के रूप में उभर आया है...वरना हिन्दुस्तानी संस्कृति प्राचीन काल में इस तरह के हीन कवचों से दूर रही है...
      अगर मुग़ल आतातायी भारत नहीं आते तो, पर्दा प्रथा का अविर्भाव नहीं होता, न गोदना हमारे शरीर पर छपते, ना ही घरों में महिलाओं को ताले में रखा जाता और न ही उनसे चुप रहने को कहा जाता, न ही उनसे सिर झुकाकर या नजरें नीची करके चलो कहा जाता...

      प्राचीन भारतीय संस्कृति में नारी हमेशा स्वतंत्र थी, कोई पर्दा नहीं, कोई अंकुश नहीं | वो शक्तिरूपा थी, मातृप्रधान परिवारों का आधिपत्य था, स्वयंवर जैसे अनुष्ठान थे.....आज भारतीय समाज कुछ हद तक मुगलों से तो मुक्त हो गया है, लेकिन मध्ययुगीन उस सोच से मुक्त नहीं हो पाया है, जो मुगलों के भय से उत्पन्न तो हुआ था, लेकिन देखते ही देखते, निरंकुशता में तब्दील हो गया....कभी एक कहानी सुनी थी, एक मुसाफिर अपने ऊंट पर सवार कहीं जा रहा था, रास्ते में रात हो गई, मुसाफिर ने अपना तम्बू ताना और वह सो गया, रात में ऊंट को ठण्ड लगने लगी, उसने मालिक से कहा वो सिर्फ़ उसकी नाक तम्बू के अन्दर रहने दे, ताकि वो ठण्ड से बच सके, मालिक ने इसकी आज्ञा दे दी, लेकिन सुबह तक पूरा ऊंट तम्बू के अन्दर आ गया और मालिक तम्बू के बाहर....कुछ ऐसा ही हाल हम नारियों के साथ भी हुआ है....मुगलों, अंग्रेजों की मनमानी से बचने के लिए नारियों ने ख़ुद के वजूद के साथ कुछ समझौता किया था, पुरुषों के कहने पर और पुरुषों का साथ देने के लिए | लेकिन उस समझौते का खामियाजा ये हुआ, कि पुरुषों की सोच बदल गई और नारी की नियति...

      मैं विदेश में अपनी छोटी सी कोशिश से उस गौरवशाली संस्कृति को विस्तार देने की कोशिश में हूँ...जिसने दुर्गा-काली को जन्म दिया, खुशकिस्मती आप कह सकते हैं इसे, यहाँ न मुगलिया सल्तनत है, न ही मध्ययुगीन सोचों का भय और न निरंकुश खाप पंचायत, न ही तालेबान....

      जहाँ तक बेटी को बेटा कहने पर लोगों की असहमति है...मैं इसे नहीं मानती, बेटा को हम बेटा ही कहते है, क्योंकि अभी तक बेटे का वर्चस्व बेटी से ऊपर है, और अगर बेटी को बेटा कहें तो, यही साबित होता है कि दोनों बराबर हैं, बेटी को बेटी कह कर, हम बराबरी का दर्ज़ा नहीं दे रहे हैं....अगर बराबर समझना है तो दोनों को एक ही नाम से बुलाना होगा...और मुझे 'बेटा', बेहतर विकल्प लगता है, क्योंकि आज बेटी ही डिमोटेड है, उसे ही प्रोमोशन की ज़रुरत है, तो फिर क्यूँ नहीं, बेटी को बेटा कहा जाए....और यह कहना कि बेटी को बेटी ही क्यों नहीं कहा जाए, तो फिर बेटी, हमेशा बेटी ही रहेगी, ये स्पर्धा नहीं है, ये अधिकार पाने का तरीका है...और मैं इसे सही मानती हूँ...
      आशा है मैं अपनी बात कह पाई...

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    3. राजेश जी,

      संस्कृति में विकार आ गए है, नारी असमानता के प्रतिमानों के अवशेष अभी भी विद्यमान है इसको ढ़ाल बनाकर नारी के साथ धूर्तता और धोखेबाजी के प्रति भी आंख मूंद ली जाय। @"जिसको जो करना है वे करेंगे, छुपकर या सार्वजनिक रूप से।"
      ठीक है नैतिकता की कोई उपयोगिता नहीं,किसी पर भी नैतिक आचरण थोपा नहीं जा सकता। न थोपा जाना चाहिए। लेकिन इतना कर्तव्य भाव शेष रहना चाहिए कि धूर्तता और धोखेबाजी पर लोगों को जागृत करे।

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    4. राजेश भाईजी,
      आपके लिए 'भारतीय संस्कृति का ही तो रोना' कहना बहुत आसान होगा लेकिन क्या यही दो चार बिंदु भारतीय संस्कृति हो गए? आपने दो चार बिंदुओं में ही सारी संस्कृति को लपेट लिया| इन बिंदुओं का निर्धारण कौन कर रहा है? जिस संस्कृति को मैं जानता हूँ वो कोई जड़ संस्कृति नहीं है जो किसी एक बिंदु पर अड़ी हुई है| जिस संस्कृति को मैं मानता और जानता हूँ वो बदलते समय के अनुरूप खुद को निरंतर पारिभाषित करती रहती है| मूल भावना और उद्देश्य हमेशा से लोकहितार्थ है और व्यक्तिगत हित इसमें सबसे नीचे के पायदान पर है| मेरी संस्कृति मेरी विचारधारा को न मानने वालों के भी अस्तित्व का सम्मान करना सिखाती है और अनावश्यक रूप से खुद को दूसरों पर और खुद पर दूसरों को थोपे जाने की झूठे सच्चे, नैतिक अनैतिक सफाई भी नहीं देती| मेरी संस्कृति विविधता को, विविधता के विभिन्न सोपानों को और उन सोपानों पर खडी विभिन्न मानसिकताओं को भी स्वीकार करती है| चिंतन के जरिये, लोकमत के अनुसार परम्पराओं को बरकरार भी रखती है और कालानुसार उनमें परिवर्तन भी लाती है|

      जिस संस्कृति को मैं जानता हूँ वो मुझे पुरुष और नारी के आधार पर पक्षपात करने की शिक्षा नहीं देती| हम भाई बहनों की शिक्षा दीक्षा, पालन पोषण में कोई भेदभाव नहीं हुआ| खानपान में भेदभाव, स्कूलिंग और कपड़ों की क्वालिटी में अंतर, मेरे लिए ये देखी हुई नहीं बल्कि सिर्फ सुनी सुनाई बातें हैं| और ये स्थिति सिर्फ मेरे घर की नहीं, बल्कि मेरे सभी मित्रों के घर परिवार की स्थिति यही है| कालेज टाईम में इधर उधर इस तरह के भेदभाव की सुनकर मैंने अपने अंदाज में एक सर्वे करना चाहा और यकीन मानिए एक भी केस मुझे ऐसा नहीं मिला जिसमें जेंडर के आधार पर इस तरह के भेदभाव की बात आई हो| आज की तारीख में भी कम से कम हम मध्यमवर्गीय परिवारों में परिवार की लड़कियों की इज्जत लड़कों के मुकाबले ज्यादा ही की जाती है, जबकि हमारी अगली पीढ़ी युवा हो चुकी है| कई बार तो पेरेंट्स को किसी बात के लिए मनाने के लिए पहले अपनी बहन को फोन करके वीटो इस्तेमाल कराना पड़ता है, फिर सिफारिश मंजूर होती है और सच मानिए इस सबमें बहुत अच्छा भी महसूस होता है| अपने लड़कों की कई जिद मेरे द्वारा ठुकरा दी जाती हैं लेकिन जब वो वाया उनकी कजिन आती है तो कुछ सवाल जवाब के बाद हाँ में ही जवाब देना बनता है| और ये सब किसी प्लानिंग या साजिश के तहत नहीं होता, सहज ही ऐसा होता जाता है| हमारी नजर में ये सांस्कृतिक तरीका है अपने परिवार की लड़कियों का कांफिडेंस लेवल बढाने का, वस्तुस्थिति समझने समझाने का|
      जारी....

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    5. - २ -

      इस सबके अलावा मुझे नहीं लगता कि मेरे घर का कोई काम किसी एक पक्ष के तानाशाह रवैये से निर्धारित होता हो, ब्याह शादी में शगुन देने से लेकर कोई फर्नीचर खरीदना हो या कोई और बड़े से बड़ा काम होना हो जो भी होता है एक सलाह मशविरे से होता है| पिताजी से कुछ पूछता हूँ तो जवाब मिलता है अपनी माँ से बात करो और कभी माँ से पूछा तो वो हमेशा कहती हैं कि अपने पापा से सलाह करो| फैसला वही होता है जो लगभग सर्वमान्य होता है| मेरे लिए ये भी अपनी संस्कृति पर गर्व करने का विषय है|

      अब इसी बात पर दूसरे सिरे से सोचते हैं| दुनिया में हर तरह के लोग हैं, मेरे जैसे भी और मेरे से उलट विचारों वाले भी| और यही वजह है कि मुझे दिखेगा कि मेरे परिवार की किसी महिला का कहीं जाना, odd hours में कहीं जाना, किसी और तरीके से असुरक्षित है तो कोई इजाजत नहीं है| मैं अपने आश्रितो को किसी सुधारवादी प्रयोग के लिए 'गिनीपिग' बनने की इजाजत नहीं दे सकता| मुझे उदार, प्रगतिशील कहलवाने का कोई शौक नहीं है| वैसे शुरुआत सही हो जाए तो इस सबकी नौबत ही नहीं आती, मेरा खुद का अनुभव है| एक बार अपना भला बुरा सोचना आ जाए तो दूसरों के लिए ज्यादा कुछ करने को बचता नहीं है|

      मैंने अपने खुद का उदाहरण दे दिया (हालांकि एकाध लाईन लिखने के बाद पोस्ट करने से पहले ये सोचकर डिलीट कर दी कि हो सकता है मैं ही जल्दबाजी कर रहा हूँ), सुविधा हो तो बताईयेगा कि क्या आप अपने परिवार में वो सब करते हैं जिसकी बिना पर संस्कृति पर रोना आया? अगर आप वो सब करते हैं, तो आपकी चिंता एकदम जायज है और अगर आपके परिवार में ये सब नहीं होता, मेरे घर में ये सब नहीं होता, मेरे परिचित घरों में किसी में नहीं होता तो ऐसी अफवाहें कौन फैला रहा है? कोई अपराध होने पर जांचकर्ता सबसे पहले यह देखते हैं कि इस अपराध से फायदा किसे हो रहा है, वही प्राइम सस्पेक्ट्स के घेरे में आते हैं|
      वैसे मैं किसी से नहीं कहता हूँ कि इस संस्कृति पर गर्व करो, मैं खुद ही गर्व कर लेता हूँ:)

      अब देखिये, सोमेश की शुरुआती आपत्ति थी पोस्ट के रूपक को लेकर और आप खुद लंबे समय तक संपादक रहे हैं लेकिन मामला संस्कृति तक न आता तो क्यों लिखता मैं इतना सब? सीधे से मान ही लेता कि यार हम कौन सा नामी गिरामी लेखक हैं या हमने कौन सा कोई बयाना ले रखा है कि सब नाप तौल कर ही लिखेंगे:) बात निकली और दूर तलक आ गई, शेष फिर|
      सादर आभार|

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    6. संजय जी, आपकी हर बात से सहमति है। मैं स्‍वयं भी इसी तरह के मूल्‍यों में न केवल विश्‍वास करता हूं, बल्कि व्‍यवहार में भी लाता हूं।
      *
      मेरा कहना यही है कि भारतीय संस्‍कृति की दुहाई देकर उसे सिर पर बैठाने पर तुले रहते हैं,भला क्‍यों। हम क्‍यों नहीं मानवीय मूल्‍यों की बात करते। क्‍यों हम मानवीय मूल्‍यों को पूरब पश्चिम के खांचे में बांटकर देखते हैं।
      *
      और निजी जिन्‍दगी के इतने उदाहरण हैं कि उन्‍हें अगर बताने बैठें तो लोगों को लगेगा कि हम अपनी बढ़ाई कर रहे हैं।

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    7. यही विशवास था राजेश भाईजी|
      एक आम आदमी के निजी जिंदगी के उदाहरण कम से कम मेरे लिए ज्यादा प्रेरक होते हैं, लोगों के मानने न मानने की परवाह गलत काम करने वाले नहीं करते और हम आप करते हैं, ये भी तो एक विद्रूपता है सिस्टम की|

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  28. अगर मुग़ल आतातायी भारत नहीं आते तो, पर्दा प्रथा का अविर्भाव नहीं होता........मुगलों, अंग्रेजों की मनमानी से बचने के लिए नारियों ने ख़ुद के वजूद के साथ कुछ समझौता किया था, पुरुषों के कहने पर और पुरुषों का साथ देने के लिए | लेकिन उस समझौते का खामियाजा ये हुआ, कि पुरुषों की सोच बदल गई और नारी की नियति...

    भारतीय संस्कृति में आयी विकृति और नारी दुर्दशा का यह यथार्थ है। यही जमीनी सच्चाई है, राजस्थान में जौहर विवशता और उससे उपजी सती प्रथा इसके धधकते साक्ष्य थे। राजस्थान के सीमांत प्रदेशों में रूढ़ घुंघट प्रथा उसी आतंक के अवशेष है। यह धरातल की सच्चाई है। कौन इतिहास लिखेगा कि एक भारतीय संस्कृति में नारी के दर्जे को दोयम बना देने के कारक बर्बर कबीलाई जंगली संस्कृतियों से सुरक्षा के उपाय थे। फिर तो श्रेष्ठता और स्वाभिमान के प्रतिमान ही बदल गए। सत्ताशीन कुलिनवर्ग की बुराईयां भी आम जनता अपना कर गर्वित दिखाती है। बाहरी विचारों का प्रभाव भी किस किस तरह रंग दिखाता है, यही दुर्भाग्य है। बहुत सुन्दर प्रस्थापना अदा जी।

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  29. अब इसी बात पर दूसरे सिरे से सोचते हैं| दुनिया में हर तरह के लोग हैं, मेरे जैसे भी और मेरे से उलट विचारों वाले भी| और यही वजह है कि मुझे दिखेगा कि मेरे परिवार की किसी महिला का कहीं जाना, odd hours में कहीं जाना, किसी और तरीके से असुरक्षित है तो कोई इजाजत नहीं है| मैं अपने आश्रितो को किसी सुधारवादी प्रयोग के लिए 'गिनीपिग' बनने की इजाजत नहीं दे सकता| मुझे उदार, प्रगतिशील कहलवाने का कोई शौक नहीं है| वैसे शुरुआत सही हो जाए तो इस सबकी नौबत ही नहीं आती, मेरा खुद का अनुभव है| एक बार अपना भला बुरा सोचना आ जाए तो दूसरों के लिए ज्यादा कुछ करने को बचता नहीं है|


    sanjay
    this is the gender bias of indian society that we cannot allow woman because they are not safe . i am not saying you should allow and make them 'गिनीपिग'
    i am saying that stop your son / men folk also to move out at odd hours , if that happens then there is equality

    if daughter is asked to come back at 8 pm so should the son , because if the son is out then he can be threat to someone else daughter

    dont chain woman just because man dont know how to behave ,MAKE MAN BEHAVE and this will happen only if the same rules that u / we implement for daughters implement for our son

    आपके लिए 'भारतीय संस्कृति का ही तो रोना' कहना बहुत आसान होगा लेकिन क्या यही दो चार बिंदु भारतीय संस्कृति हो गए? आपने दो चार बिंदुओं में ही सारी संस्कृति को लपेट लिया|

    Sanjay
    Is it possible for any one to talk on all points of Bhartiyae Sanskriti that are not related to the post I dont think so
    Why should in every thing we have to pull purab , pashchim . Are we Indians { who live in india } fools that we are always told that we copy west and we dont value our culture ??
    This post had nothing to do with Indian Culture but still most discussion went in that direction ??? Why ??? And if the initial discussion did not antagonize u why the Rajesh comment did ????

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  30. सुज्ञ जी / अदा जी
    मुगलों को गए और कितने वर्ष बीत चुके आज़ाद हुए , इतने वर्षो बाद भी जब हम चूडी , बिंदी , घुघंट , साड़ी इत्यादि को संस्कृति का हिस्सा क्यूँ बनाए हुए हैं अगर ये महज रक्षा कवच थे . जब मुग़ल नहीं रहे , अग्रेज चले गए तो क्यूँ आज भी संजय जी को अपने घर की महिला को odd hours में बाहर जाने के लिए अंगरक्षक देना जरुरी महसूस होता है . तब महिला असुरक्षित थी क्युकी भारतीये पुरुष नहीं था मुग़ल / अग्रेज इत्यादि थे तो अब तो वो सब नहीं हैं फिर भी भारतीये महिला असुरक्षित ही हैं . कौन सी भारतीये संस्कृति हैं ये जिसको ले कर सब इतना चिंतित हो जाते हैं या भारतीये संस्कृति केवल और केवल महिला को दबे ढंके , घर में रहने से ही होती हैं भारतीये संस्कृति में पुरुष के लिये आचार , विचार , रुचियों का परिष्कार इत्यादि पर समान्तर चर्चा करने से क्यूँ हिचक होती हैं

    बार बार पश्चिमी सभ्यता की बात उठा कर मुद्दे को भटकाया जाता , जब समानता की बात करो नारी का पुरातन रूप वो मुगलई इरा वाला उसको ही क्यूँ भारतीये संस्कृति कहा जाता हैं
    फिर इतिहास के उस हिस्से से या तो पीछे की बात हो या आगे की

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    1. रचना जी;
      शायद आप मेरी बात नहीं समझ पाईं या मैं सही तरीके से समझा नहीं पाई...
      मैंने मुगलों का नाम इसलिए लिया क्योंकि यही वो दौर है जब महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में बदलनी शुरू हुई, उसके पहले नारियाँ की स्थिति सशक्त थीं, इस बदलाव के बहाने से पुरुषों की मानसिकता बदली...और इस मानसिकता को धीरे-धीरे पुरुष वर्ग एन्जॉय करने लगा, और सही भी है जब धौंस जमाने की आदत हो जाए तो उसे छोड़ता कौन है....इसी मानसिकता ने आज सिर्फ़ भारतीय समाज ही नहीं कई दूसरे समाजों में नारी की ये हालात की है, मुगलों और अंग्रेजों के रहते हुए ही, सामंतवाद की शुरुआत भारतीय समाज में हो गई थी, जिसके कोपभाजन मुख्यरूप से बने थे ग़रीब और नारियाँ, लेकिन ज़मींदार प्रवृति घर-घर में पहुँच गई...जो पुरुष बाहर अपनी सामंती नहीं दिखा सकते थे, उन्होंने घर में अपनी-अपनी नारियों पर दिखाना शुरू किया, इसी सामंती प्रवृति ने भारतीय समाज में पुरुषों की मनमानी को जन्म दे दिया...पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह प्रवृति आगे बढ़ती चली गई....और अब पुरुष समाज को इस प्रवृति की आदत हो चुकी है, उन्हें लगता है यही सही है...और फिर जो आदत हो जाए उसे छोड़ना आसान भी नहीं होता है, और न ही पुरुष वर्ग इस सामंती प्रवृति को छोड़ना चाहता है, इससे उनके अहम् की सम्पूर्ण संतुष्टि तो होती है...इसी सामंती प्रवृति ने दूसरी वर्जनाओं को जन्म भी दिया है, लेकिन अब समस्याएं थोड़ी और जटिल होने लगीं हैं....क्योंकि नारी अपने मनोनुकूल कदम उठा रही है, अब जो नारी पुरुषों के अधीन थी, अब स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील दिखने लगी है, तो बर्बरता बढ़ेगी ही....हाथ से जब सब कुछ निकलता हुआ किसी को नज़र आएगा तो वो हर कोशिश करेगा अपनी पकड़ मजबूत करने की, इसलिए आज ये खाप पंचायत, ये तालेबान, ज्यादा सक्रीय हैं, जब तक नारी चुपचाप सब कुछ उनके कहे अनुसार करती रही, कहीं कोई समस्या नहीं हुई ...जिस दिन से नारी ने अपने जीवन की डोर अपने हाथ में लेने की सोची उसी दिन से, उसके जीवन की पाबंदियां बढ़नी शुरू हुई हैं...आज हम आए दिन ओनर किल्लिंग देख रहे हैं, जबकि दुनिया, तकीनीकी, आर्थिक, उद्योग के मामले में बहुत आगे बढ़ चुकी है....फिर भी ऐसा हादसे, सिर्फ़ इसी बात की ओर इंगित करते हैं, कि पुरुष किसी भी हाल में, स्त्री पर अपना शासन नहीं छोड़ना चाहता है...क्योंकि नारी आज भी vulnerable है और यही वो जगह है, जहाँ पुरुष की हर मनमानी चलती आई है, यह बहुत कायदे से किया गया काम है, पहले नारी को आतताइयों ने नारियों को खौफज़दा किया, हमारे लोगों ने उसे, परदे में डाला, उनका घर से निकलना बन्द किया गया, फिर उनकी पढ़ाई-लिखाई बन्द की गई, यहाँ तक कि उन्हें उनकी पहचान तक से महरूम कर दिया, धीरे-धीरे पुरुष समाज का अंकुश इतना बढ़ गया कि, नारी ने ख़ुद ही मान लिया, यही उसकी सही जगह है, लेकिन अब नारी ने अपनी सही शक्ति पहचान ली है, अब उसके अपने जीवन के फासले ख़ुद करने शुरू कर दिए हैं ....ज़ाहिर सी बात है उसके ऐसे कदन उठाने पर हंगामा तो होना ही है.... ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे फिल्मों में अक्सर देखा है, किसी निरंकुश जमींदार के राज में किसी निरीह किसान का विद्रोह...

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    2. जहाँ तक साड़ी, बिंदी चूड़ी को हमारी संस्कृति का हिस्सा बनाने कि बात है..तो यह हर देश के साथ है...हर देश का अपना पहनावा, अपना खान पान होता है..जो उसकी संस्कृति को दर्शाता है, उस देश की पहचान होती है...
      अपनी पहचान ही खोना, इसमें क्या समझदारी है...
      अफ्रीका के लोग अपनी वेश भूषा पर गर्व करते हैं, अँगरेज़ अपनी वेश-भूषा पर...
      साड़ी भरतीयता की पहचान है....ये सारे चिन्ह हैं जो भीड़ में हमें अपनी पहचान दिलाते हैं....हर देश का अपना झंडा होता है, अपना पहनावा होता है और अपना खान-पान होता है....

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    3. प्रिंस चार्ल्स आज भी जब कहीं जाते हैं अपनी स्कोटिश ड्रेस में जाते हैं, उन्हें उसपर गर्व है, अरब के जितने भी लोग जहाँ भी जाते हैं अपने ही कपड़ों में जाते हैं, उन्हें अपने पहनावे पर गर्व है, अफ्रीका के लोग अपनी पोशाक ख़ुशी से पहनते हैं, यह उनकी संस्कृति का परिचायक है, फिर हम भारतीयों को इससे परहेज़ करने का तात्पर्य क्या है...साड़ी देखते साथ लोग उसे भरतीयता से जोड़ते हैं...जो बहुत अच्छी बात है...ये हमारी संस्कृति है और इसे बरकरार रहना ही चाहिए...ऐसा न हो कि ये धरोहर लुप्त हो जाए और हमारी आगामी पीढ़ी अपनी पहचान से महरूम रह जाए....ये सारे चिन्ह हमारी संस्कृति के धरोहर, और हमारी पहचान हैं...इनको बचाना हमारा फ़र्ज़ है...

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    4. प्रिंस चार्ल्स आज भी जब कहीं जाते हैं अपनी स्कोटिश ड्रेस में जाते हैं, उन्हें उसपर गर्व है, अरब के जितने भी लोग जहाँ भी जाते हैं अपने ही कपड़ों में जाते हैं, उन्हें अपने पहनावे पर गर्व है, अफ्रीका के लोग अपनी पोशाक ख़ुशी से पहनते हैं, यह उनकी संस्कृति का परिचायक है, फिर हम भारतीयों को इससे परहेज़ करने का तात्पर्य क्या है...

      kyuki sab kartae haen isliyae bhartiyae bhi karae aur phir yae taana bhi sunae ki ham unko copy kartae haen

      ham isliyae kuchh karae ki hamae pasand yaa napasand haen
      yaa mehaj isliyae ki wo peedhiyon sae ho rahaa haen

      bhartiyae sanskriti me kahin kisi bhi jagah maenae aaj tak nahin padhaa ki saari hamari national dress haen

      yaa ki agar saadi nahin pehnii gayii to bhartiyae sanskriti viplupt ho jayegi

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    5. Bharteey sanskriti mein aapne ye bhi nahi padha hoga ki Tiranga hamaare desh ka jhanda hai...

      Bina kisi kaagzi karvaahi ke Hindu shaadi ko manyata hoti hai hamaare samaaj mein sirf gawaahon ke aadhar par...
      Theek usi tarah saari ko hamaare desh ke paridhaan ki manyta hai...

      हटाएं
    6. Is prashn ke uttar ke liye ek prash hi poocha jaaye poore vish ke samaksh :

      'SAARI KIS DESH KA SANSKRITIK PARIDHAAN HAI?'

      Jo bhi uttar mile wo sweekary hoga...

      हटाएं
    7. Bina kisi kaagzi karvaahi ke Hindu shaadi ko manyata hoti hai hamaare samaaj mein sirf gawaahon ke aadhar par...

      Dear Mam
      Please know ignorance is not a bliss
      Indian marriages need to be registered for all legal purposes . If one needs a passport one needs a certificate . People dont follow rules they follow customs and that is the biggest impediment
      Most girls are left by NRIS in india after marriage because inspite of the rule the registering process is not taken into account .
      This is what I have been Trying to Say FOLLOW LEGAL RULES AND BE A PROUD INDIAN , FOLLOWING TRADITIONS AND CUSTOMS IS A PERSONAL CHOICE AND SHOULD BE LEFT TO INDIVIDUAL

      And
      As regards sari , Indian national costume still happens to be langha chunii and not sari sarii is the modification of chunni as langha could not be worn every where and when neta ji made a laxmi bai brigade he asked the woman warriors to wear military uniform and those warriors are still the most respected indian ladies

      As regards the indian TRICOLOR
      It was adopted in its present form during a meeting of the Constituent Assembly held on 22 July 1947, when it became the official flag of the Dominion of India.

      हटाएं
    8. संस्कृति एक विशाल अवधारणा है। चूडी , बिंदी , साड़ी संस्कृति नहीं सांस्कृतिक पहचान है। जब ऐसी पहचान उजागर करने की आवश्यकता हो करे, न भी करे तो भाव पर आधारित संस्कृति को कोई अन्तर नहीं पडता। वस्त्राभुषण शृंगार आदि से संस्कार अन्तर में नहीं उतर जाते। इसलिए सांस्कृतिक पहचान देनी है धारण करो न देनी है तो न करो। संस्कृति से इसको कोई फर्क नहीं पडता।

      साथ ही इन वस्तुओं के प्रयोग करने न करने पर नारी समानता के उद्देश्यों को भी कोई अन्तर नहीं पडता।

      FOLLOW LEGAL RULES AND BE A PROUD INDIAN ,

      विधि-विधानों व संविधान का पालन 'गौरव' का विषय नहीं है। कानूनों नियमों का मात्र 'आदर' होना चाहिए, आदर में ही उसकी सार्थकता निहित है। सांस्कृतिक मूल्यों की तरह गौरव का उन नियमों में कोई योगदान नहीं होना है। विधि-विधान, संस्कृति का विभाग नहीं है। यह दोनों अलग अलग विषय है। संस्कृति में मुख्यता 'भावनाओं' की है, जबकि कानून भावनाओं पर नहीं चलता।

      भले लहंगा-चुन्नी राष्ट्रिय परिधान हो, विधान उन्हें अनिवार्यतः पहने को बाध्य नहीं करता। साडी भले उस पोषाक का रूपांतरित परिधान हो, विधान लोक-मान्यता में साडी की भारतीय पहचान का निषेध नहीं करता। आजाद हिंद फौज में में वर्दीधारी वीरांगनाएँ थी तो आजादी के संघर्ष में साडीधारी वीरांगनाएँ भी थी। दोनों ही सम्मानित है। इसमें संस्कृति को कहाँ आपत्ति हुई है? झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने साडी पहनी थी, योगानुयोग वह मराठी स्टाईल में पहले से ही पहनती थी। जो घुडसवारी के अनुकूल थी। उसनें उस समय का पुरूष-घुडसवार वेश भी धारण किया होगा तब भी संस्कृति ने इतना ही सम्मान देना था।

      यदि संविधान को ही भारतीय संस्कृति मानना है तो भारतीय संस्कृति का जन्म ही 1950 के बाद हुआ। उससे पहले शायद भारतीय संस्कृति का अस्तित्व ही नहीं था।

      राष्ट्रिय प्रतीको का निरादर करना अपराध है, किन्तु उन्हें सबकुछ मानने की जबरदस्ती नहीं थोपी गई है। उन प्रतीकों को उत्कृष्ट भावनात्मक पूज्य सम्मान देना भी व्यक्तिगत है। फिर संस्कृति का निर्वाह तो हमेशा से ही व्यक्तिगत व भावना प्रधान रहा है। सभी की व्यक्तिगत राष्ट्रनिष्ठा मिलकर ही तो सामुहिक राष्ट्रप्रेम बनते है। क्योंकि यह भावनात्मक मुद्दा है, और संस्कृति भी उसीतरह भावनात्मक!!

      हटाएं
    9. @Rachna ji,

      kitno ke maata-pita ke paas apne vivaah ka kaagaj patar hai ye bhi zara pooch lijiye...kyonki agar nahi hai wo sabki shaadi avaidh karara di jaaye...

      hamari shaadi ka bhi koi kaagaz nahi tha, hamne bhi baa mein ye kaagaz liya tha jab ham vides yaatra par nikle...
      blog mein hi jitni mahilaayein ya purush hain unse hi pooch liya jaaye kis kis ne apni shaadi register karwaa li hai...??

      jisne nahi register karwaayi kya use samaaj manyta nahi de raha hai..??

      jahan tak saari ka prashn hai, lahanga chinni se saari tak safar usne kar hi liya hai..swatantrata sangram ki jitni bhi tasveer dekh lijiye kisne lahanga chunni paha rakha hai...saari ko manyta bahut pahle hi mil chugi hai...mahaari jitni bhi deviyon ki tasveer hai adhiktar ne saari hi pahni hui hai..lahanga chinni waali deviyaan maine to nahi dekhi...isse bhi pata yahi chalta hai ki sanskriti ne saari ko hi apnaaya hua hai...

      jahan tak tirange ki baat hai wo sanskriti ka nahi samvidhan ka chinh hai...sanskriti mein to bhagwa aur bajrangbali ke hi jhande hain...

      and now I rest my case...
      aapko jo maanana hai aap maane aur mujhe jo manana hai main manoongi...PERIOD

      हटाएं
    10. kitno ke maata-pita ke paas apne vivaah ka kaagaj patar hai ye bhi zara pooch lijiye...kyonki agar nahi hai wo sabki shaadi avaidh karara di jaaye...

      Mam
      The issue is not if there marriage is invalid the issue is that the court of law does not any more accept marriages without registration
      When my father expired ,my mother was asked to certify that she is his legal wife and its almost 17 years back , Because there was no ceritificate she was asked to submit afiidavit and witness was needed

      When we go into a problem we can only go by a process which legal and acceptable and not by sanskriti

      sanskriti is a set of prevailing customs and nothing more
      we can be proud of them or we may dislike them but we can never go with them when there is any type of problem

      jinhone nahin registar karvyaaii haen unko karvaani hogi
      ab aesaa hi kanun aa rahaa haen

      हटाएं
  31. रचना जी,
    आखिरी वाली बात सबसे पहले, I am not antagonied at all. कोई भी डिस्कशन मेरे लिए जानने बूझने तक मह्त्वपूर्ण है, ये कोई शास्त्रार्थ या WWF नहीं कि हारजीत के फैसले से ही बात खत्म हो| राजेश जी के कमेन्ट से मुझे कोई दिक्कत नहीं, जैसा मुझे सही लगा मैंने अपना पक्ष रखा| होता यही है कि चुप रहे कोई तो सवाल उठते हैं कि चुप क्यों रहे? जवाब दें तो ऐसा क्यों लगा? सवाल के जवाब में सवाल हो तो ये आरोप कि आप दुराचारियों का समर्थन करते हैं| राजेश जी से थोड़ा बहुत परिचय अपना भी है, और उनका स्वयम का सम्पादकीय अनुभव भी है| उन्हें भी अगर मेरा जवाब उसी स्पिरिट में लगा तो फिर इस बारे में आगे बात कर लूंगा|
    आप equality के लिए कटिबद्ध हैं, आपके अपने तरीके हैं| आप उन्हें अपनाने के लिए स्वतन्त्र हैं| मेरी अपनी परिस्थितियाँ हैं, मेरे अपने तरीके हैं| मेरे किसी गलत काम के लिए मेरे पिताजी की तरफ से मुझे कोई फेवर नहीं मिलनी है, ये मैं बहुत पहले से जानता था जब आपसे परिचय तो बहुत दूर की बात है, ब्लॉग जगत से भी परिचय नहीं था, you are not going to get any credit for it.:) और ये आज भी सच है, इसके अलावा मेरा बेटा भी मेरे से किसी फेवर की उम्मीद नहीं रखता, गलत करेगा तो सजा पायेगा| इसी दम पर मैंने वही कहा जो मुझे ठीक भी लगता है और जो मेरी रेंज में भी होता है| it is not possible for me to stop all men from moving out at odd hours, hence I focus myself at the options available with me & that's the very reason, I used that particular term 'GP'. You might have the authority or power to do so, you can try that way.
    To agree or disagree is\was never mandatory, neither for me nor for anybody else.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. राजेश जी,
      भावनाएँ समझने के लिए शुक्रिया तो आपका बनता है, वरना मैं ही रक्षात्मक मुद्रा में होता:) सच में परिपक्वता बहुत मायने रखती है|

      हटाएं
  32. "GP" term was used because it is used when we experiment and the same way i used it
    and i said u have a right not to let them be "gp"

    that not to sacrifice them for the sake of experiment

    and previously i said that आप भी उसको रोक सकते हैं लेकिन ना रोके क्युकी व्यवस्था आप के साथ नहीं खडी होगी और आप असुरक्षित होंगे .

    which is indicative that we need to be safe but does that mean that we need to chained ??? to homes on pretext of "bhartiyae sanskriti "

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपने मेरी सुरक्षा की परवाह की, उसके लिए तहेदिल से आभार|
      अब मेरे परिवार की सुरक्षा, वो सबसे पहले मेरा जिम्मा है और मैं उसे मेरे हिसाब से निभाने की कोशिश करता हूँ|

      हटाएं
  33. बडी अजीब बात है रचना जी, आपने यह नहीं देखा जब कहा गया कि "क्या यह है हमारी भारतीय संस्कृति?" तब बताना पड़ा कि यह हमारी संस्कृति कभी नहीं थी। इसीलिए उसकी उत्पत्ति और प्रादुर्भाव पर कहना पड़ा। और वह अटल सच्चाई है। यह विकार आया है हम स्वीकार करते है इसीलिए उसे विकार स्वीकार किया गया। और जो पश्चिमी संस्कृति पर हमारी तरफ से तो कोई दोषारोपण नहीं हुआ। गलती हमारी और दोष पराई संस्कृति को क्यों दे? दोष हमारे ही लोगों का है जो उस तरफ ललचाई दृष्टि से देखते है और उनकी तरह कुलिन दिखने का भ्रम पालते है। दोष हमारा है नकल करके छ्द्म संभ्रात दिखने का नाटक करते है।
    मुगलों और अंगेजों के जाने से सब ठीक हो जाता है तो यह भी बहुत बडा भ्रम है। मैने पहली टिप्पणी में कहा था, सुरक्षा के लिए अपनाए गए उपाय अन्तत: इज्जत का पर्याय वब गए, इसका समर्थन नहीं करते पर रूढ़ हो गए यह एक कडवा सच है। कोढ में खाज की उस समय के मोगल तुर्क आदि सत्ताधारियों नें सभ्रांत समृद्ध लोगों के कुल स्वाभिमान की तरह स्थापित कर दिया। कुरितियां जाती बडी मुस्किल से है। जैसे एक मुहावरा आम है कि अंग्रेज तो चले गए अंग्रेजीयत छोड गए। ठीक वैसे ही मुगल तुर्क अंग्रेज भले चले गए पर विकृतियों के चिन्ह छोड़ गए। फिर भी उन्हें दोष नहीं दिया जा रहा, कुरितियां दूर भी हम करते रहे है और आगे भी करते रहेंगे। यह भारतीय संस्कृति ही है जिसे अच्छे से पता है कालान्तर से विकृति रूपी मैल भी लगना ही है और पुनः स्नान कर शुद्ध बनना होता है, वह स्वयं खुद को परिष्कृत करती रहती है। जीर्णोद्धार,क्रियोद्धार, शुद्धोंद्धार इस संस्कृति के स्वीकृत सिद्धांत है। मुगल तुर्क अंग्रेज चले जाने से समाज के सभी भेडिए नहीं चले गए। बुरे लोगों का आस्तित्व तो पूरे संसार में रहना है। सुरक्षा ही उपाय होता है। जिस देश के कोई शत्रु नहीं भी होता फिर भी उसका सुरक्षा सैन्य जरूरी भी है और सीमा पर तेनात भी रहता है। जैसा कि संजय जी नें कहा था समाज 'वाईल्ड लाईफ सैंक्चुरी' की तरह है, जब जानवर खुल्ले घुम रहे है तो सुरक्षा के पिंजरे में हमे रहना होगा, सावधान हमें रहना होगा। सबलता दिखाने के लिए असुरक्षित सैंक्चुरी में जाना कहाँ कि बुद्धिमानी है? ठीक याद आया, आपने 18 साल की बात की थी, उम्र शारिरिक व्यस्कता का पैमाना होता है समझ का पैमाना नहीं बुद्धिमता या विवेक का पैमाना नहीं। बुद्धिमता का मापन उम्र की लम्बाई में नहीं जीवन की उँचाई में होता है।
    घर के सदस्यों को क्यों न दिया जाय संरक्षण और सुविधा। क्या दुनिया को नारी को सबल प्रबल दिखाने मात्र के सुरक्षा साधन हटा लें? जबकि घर की महिला चाहे या न चाहे?
    देखना ही पडेगा कि odd hours में मार्ग अगर सुरक्षित है, महिला सक्षम है, और जाना आवश्यक भी तो कोई हर्ज नहीं है। अन्यथा क्यों 'गिनिपिग' की तरह प्रस्तुत करना? इसकी आवश्यकता समझ के बाहर है।
    हम तो बेटों पर भी वही संरक्षण सिद्धांत वाला अनुशासन रखते है। अपने परिवार को संरक्षण सुरक्षा सुविधा हम नहीं देंगे तो कौन देगा? दूसरों के लिए तो आक्रोश पैदा करने का सहज लभ्य समाचार ही बन जाएगा न। मात्र एक बार बेटा रात 11 बजे घर आया था, उसे पूछा तो कहा मित्रों के साथ रोड पर ही गप्पें लडा रहे थे। मैने कहा तुम्हें पता है कैसे लोग देर रात सडकों पर होते है? वह समझ गया। बेटा हो या बेटी अनुशासन सभी के लिए जरूरी है। चरित्र की चिंता भी सभी की। जब कोई दुर्घटना होती है तो घायलों में अधिक घायलों का उपचार पहले किया जाता है जिनकी मृत्यु की जोखिम हो उनका त्वरित ईलाज किया जाता है। क्योंकि थोडा घायल देरी से मर नहीं जाएगा, पर गम्भीर जख्मी अवश्य मर जाएगा और मरने के बाद कितने भी विचार करो कुछ भी शेष नहीं रहेगा।
    यह सब समान्तर चर्चा ही है। और हम सम्यक् दृष्टिकोण से ही चिंतन कर रहे है। किसी एक पक्ष में न कम न ज्यादा।

    @कौन सी भारतीये संस्कृति हैं ये जिसको ले कर सब इतना चिंतित हो जाते हैं.

    आप भले विकारों को संस्कृति मान त्याग दें, शुद्ध संस्कृति को भी हेय माने, गौरव न लें। आपकी मर्जी। मैं तो तब तक गौरवानुभूति करूँगा, स्मृति में रखुंगा जब तक शुद्ध रूप से जीर्णोद्धार होकर मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने नहीं लग जाती।

    वही भारतीय संस्कृति जिसमें कुंठाएं नहीं है। खुद में पुनः परिस्कार की क्षमता है। जिसने सभ्य बनने की कला सबसे पहले हासिल कर ली थी, उसका गुणानुवाद इसलिए कि उसमें से सुसंस्कृत बनने की कला को शीघ्रातिशीघ्र वापस खोज लाएं, हमारा व्यर्थ काल व्यतीत न हो जाय। उसकी स्मृति बनी रहे, उसकी जानकारी बनी रहे। क्योंकि सर सलामत तो पगडी हजारों।

    उत्तर देंहटाएं
  34. @ संजय जी


    आपने मेरी टिप्पणी के उत्तर में जो सफाई दी है मैं उन सबका सविस्तार जवाब दे सकता हूँ पर दूंगा नहीं. क्यों? तीन कारणों से. पहला तो ये कि इस तरह बात खींचें तो बात कहीं से कहीं पहुँच जाएगी. मूल विषय से भटककर बहस चालू हो जाएगी. जो मुझे कहना था वो पहले ही कह चूका हूँ. दूसरा ये कि आप के साथ साथ आपके समर्थकों को भी मुझसे चिढ़ हो जाएगी और मुझे घेरने कि कोशिश कि जाएगी. ब्लॉग आपका है यहाँ हर किसी से संवाद विवाद मैं नहीं करना चाहता. तीसरा यह कि आपकी यह रचना मुझे बहुत सतही और हलकी लगी तो अब आप चाहे जितने तर्क दें दें इस रचना के बारें में मेरे विचार बदलने से रहे. फिर क्या फायदा बात बढाने से.



    यह जरुर दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर कमेन्ट किया भी तो उस पोस्ट पर जो मुझे पसंद नहीं आयी. पर ऐसा किसी दुर्भावनापूर्वक या जानबूझ कर नहीं किया गया है. अगली बार इसकी भरपाई करने कि कोशिश करूँगा. यदि पोस्ट पसंद आई तो. :) आप भी जानते हैं कि जब मुझे आपकी कोई पोस्ट पसंद आई है तो मैंने मुक्त कंठ से प्रशंषा की है फिर जो पसंद नहीं आई उसे कहने में क्यों हिचकूं? फिर मैंने केवल पसंद नहीं आया कहकर पल्ला नहीं झाड़ा बल्कि कारण भी बताया है. अब इसके बदले यह ताना भी झेलना पड़ रहा है तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं - "so rest assured. rather you will be seen as a rising star, broad minded and practical and understanding and so on, good luck."


    अब आप मेरे इस कमेन्ट का जवाब दें न दें मैं इस पोस्ट पर अब कोई कमेन्ट नहीं करूँगा.



    @ सुज्ञ जी

    नमस्कार


    आप से केवल इतना ही कहना चाहता हूँ की जब मैं कोई भी रचना पढ़ता हूँ तो लेखक से पूछने नहीं जाता हूँ की इसे समझाएं. कहीं पढ़ा था मैंने कि कोई चित्र या कहानी -कविता क्या कहना चाहती है यह उस चित्र या रचना से ही पूछना चाहिए यदि वह कुछ स्पष्ट न करें तो रचनाकार या कलाकार से पूछना व्यर्थ है. पाठक अपने हिसाब से अर्थ लगाता है यही रचना कि खासियत होती है लेखक हर जगह सफाई देता नहीं फिरता. इसीलिए आप लेखक कि तरफ से जो सफाइयां पेश कर रहे हैं मैं उसका उत्तर नहीं दूंगा. कारण ऊपर बता ही दिया है. यूँ भी मै संजय जी से मुखातिब था आपकी बातों का उत्तर देने के लिए मैं बाध्य नहीं हूँ. और इस रचना को मैं इतना महत्वपूर्ण भी नहीं मानता कि इस पर इतनी चर्चा की जाए. यह जरुर बता दूँ कि आप के तर्कों से मैं मुतमईन नहीं हुआ.

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    उत्तर
    1. बिलकुल!!
      मैं भी केवल पाठक ही हूँ और अपने दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया।
      आपके कमेंट पर जब तक लेखक की प्रतिक्रिया नहीं आई मैनें अपनी ओर से कोई प्रस्थापना नहीं की। बिलकुल आप मुझे उत्तर देने को बाध्य नहीं और न ही तर्कों से सहमत होने के लिए।
      आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए भी आपाका आभार मानता हूँ, अन्यथा इतनी सी बात भी पता न चलती। कृप्या मेरी किसी भी पूर्व बात को अन्यथा न लें। एक बार पुनः आभार सहित,
      -सुज्ञ

      हटाएं
    2. संजय जी,सोमेश जी
      आप दोनों मित्रों के बीच खेद उत्पन्न करने का उद्देश्य तो नहीं रहा, फिर भी कारण बना होउं तो क्षमा करें।

      हटाएं
    3. सुज्ञ जी,

      आपकी विनम्रता ने फिर प्रभावित किया है। फिर भी, जैसे सोमेश ने अपने विचार रखे वैसे ही आपने भी रखे। मुझे नहीं लगता कि आप दोनों के मतांतर में किसी भी पक्ष को क्षमायाचना की ज़रूरत है।

      हटाएं
    4. सोमेश जी,
      आपकी इस बात से सहमत कि बात बढाने से क्या फायदा? लिखा तो बड़ा वाला कमेन्ट था गूगल को भी required field blank लगा तो शगुन अच्छे नहीं, यही ठीक है:)
      जो है, जैसा है अच्छा है| मेरे मन में आपके लिए पहले भी कोई दुर्भावना नहीं थी, आगे भी नहीं होगी| अब तक जो सम्मान दिया है आपने उसके लिए आभारी हूँ|
      शुभकामनाएं|
      *
      सुज्ञ जी,
      और करो सिफारिश, होम करते यूं ही हाथ जलेंगे:) आप क्यों खेद प्रकट कर रहे हैं?
      *
      स्मार्ट इंडियन जी,
      असल में क्षमायाचना तो मुझे करनी चाहिए थी
      लेकिन रूठते को मना लें तो हमें मो सम कुटिल... कौन कहेगा? इसलिए क्षमा नहीं मांगते:)

      हटाएं
    5. स्मार्ट इंडियन जी, संजय जी,

      निज-पर सभी के चित्त की शान्ति के लिए खेद प्रकट कर मुक्त हो जाना एक अच्छा उपाय हो सकता है।
      हाथ जलने की चिंता की चिंता नहीं,क्योंकि होम ही विवेक साधने का है। :)

      हटाएं
    6. सुज्ञ जी, नमस्कार
      यूं इस पोस्ट पर मैं अब कमेन्ट नहीं करने वाला था पर आप से बात करना अनिवार्य लगा. आपका ई मेल मेरे पास नहीं था अन्यथा मेल ही कर देता. पहली बात तो जैसा अनुराग जी ने कह आपको क्षमा माँगने की या आभार प्रकट की कतई आवश्यकता नहीं है. बल्कि शायद मैं ही कुछ ज्यादा ही rude हो गया था आपके प्रति. आपके विचारों का और आपका मैं सम्मान करता हूँ. मेरी बातों को भी अन्यथा न लें. भले ही मैंने आपकी बातों का उत्तर न दिया हो पर आपने इस पोस्ट पर अपने विचार गंभीरता से दिए हैं जो आपके गहन चिंतन को दर्शाते हैं. अब मतभेद तो होते रहते हैं. मेरे और संजय जी के बीच कोई खेद या दुर्भावना नहीं है और मैं उम्मीद करता हूँ कि आपके और मेरे बीच भी नहीं होगा. :)
      आभार
      सोमेश

      हटाएं
    7. सोमेश जी,

      मेरे मन कोई दुराग्रह कोई दुर्भावना नहीं है।
      भगवान का शुक्र कि मन को निर्मल बनाने के उपाय आज भी कारगर है।

      हटाएं
  35. विक्रम की दृष्टि और है, बेकरम की होती और
    बाज़ हैं, शिकरे भी, बेचैन बेताल का कहाँ ठौर
    ?

    पोस्ट की भावना जितनी मुझे समझ आई उसके लिये आपको आभार कहना ही पड़ेगा कि समाज में पशुओं की मौजूदगी के खतरे से आगाह किया। आपकी पिछली पोस्ट और गौहाटी की ताज़ी (और एक पिछली) घटना के तारतम्य में देखूँ तो विक्रमी नज़र और विक्रमी साहस की ज़रूरत आज कहीं ज़्यादा है क्योंकि मध्ययुग के बर्बर आक्रांता नैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, मानवीय आदि मूल्यों पर हमसे विपरीत होने के कारण दूर से पहचान में आ जाते थे। आज सारी अनैतिकता छिपी हुई है आधुनिक पहनावे, फ़र्राटेदार वाहन, सतही सौन्दर्य और धन की चमक के पीछे। नाखून तराश लिये जाते हैं, फिर किसे क्या दिखना है?

    सतही मतभेदों पर बहसें हो सकती हैं लेकिन सतह के नीचे बहुत से खतरे छिपे हैं जिनकी पहचान और निर्मूलन ज़रूरी है।

    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी आज की भाषा और अंदाज बदले बदले से हैं, पासवर्ड हैक तो नहीं हो गया? :)

      बहसों पर और उनके आधार पर किसी सर्वसम्मत निर्णय पर पहुँचने को लेकर हमारी पंजाबी भाषा में एक कहावत चलती है, 'डडडू तुलना' (to weigh frogs)
      बहस तो हमसे जितनी मर्जी करवा लो आप, 'फट्टे चक देयांगे'

      गुवाहाटी और ऐसे सच अगर तरीके से सामने आ जाएँ तो बहुत कुछ और खुलेगा| लेकिन किसे फुर्सत है बात की तह में जाने की? आसान काम यही है कि जो आरोप लगाए, उसके साथ खडा हो जाया जाए| चार नारे लगाए, हो गयी ड्यूटी पूरी|

      हटाएं
    2. इसीलिये कभी विनम्र नहीं हो पाये, जब-जब कोशिश की किसी न किसी ने टोक ही दिया। सो सैड!

      :(

      हटाएं
  36. "एक कबूतरी लहक लहक कर बिलाव पर कुर्बान होती दिख रही थी|"
    ओह!

    उत्तर देंहटाएं
  37. संजय जी
    टिप्पणियों की संख्या और बहस लंबी हो गई है मै इसे और लम्बा नहीं खीचना चाहती हूं किन्तु ना चाहते हुए भी एक आखरी बात कहना चाहती हूं की गोवाहाटी कांड में जो नया खुलासा हुआ है या ये कहे की जो पहले से ही कई लोगों द्वारा कह गया है उसमे ये कह गया है की पत्रकार ने और संपादक ने ये पूरे कांड को बढ़ावा दिया बल्कि एक हद तक रचा किन्तु ये कही भी नहीं कह गया है की लड़की इन सब में शामिल थी या उसके साथ हुआ दुर्व्यवहार कही से भी नकली था | लड़की आम लड़की ही थी (भले उसने शराब पी थी) उसके साथ दुर्वयवहार के लिए लोगों को उकसाया गया उसमे पत्रकार के मित्र भी थे और उसे शूट किया गया | इस नये खुलासे से ये तथ्य कही भी नहीं बदलता की लोगों की मानसिकता लड़कियों के प्रति क्या है, क्या किसी के भी उकसाने भर से कोई समाज किसी लड़की के साथ दुर्व्यवहार वो भी सार्वजनिक रूप से करता है तो उससे उसका दोष कम नहीं हो जाता है और ना ही उसकी मानसिकता को सही कह जा सकता है वो तब भी उतना ही गलत है , जीतन पहले था | कम से कम मै ये नहीं मानती हूं की शराब पीने के कारण किसी लड़की के साथ या किसी के भी साथ इस तरह का व्यवहार किया जाये |

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Sahmat..

      agar ye sochi samjhi saajish thi fir to baat aur bhi buri hai ki desh ka ek patrkaar jise aur bhi jimmedaar hona chahiye wo aisi maansikta rakhta hai...

      baat fir wahi ho jaati hai, news ko sansanikhej banaane ke liye naari ka hi upyog kiya gaya aakhir..kyonki agar ye kaam kisi nar ke saath hota to kya is samaachaar ko itna tool milta...

      ladki ne sharaab pee rakhi thi, ladki baajaaroo thi in baaton ke hone par bhi kisi ko ye adhikaar nahi hai ki sare aam koi kisi bhi stri ko nirvastr kare...

      हटाएं
    2. अंशुमाला जी\ अदा जी,
      ऐसे कृत्यों का समर्थन मैं कभी नहीं कर सकता| अगर कही मेरे किसी कमेन्ट से ऐसा लगा हो तो कृपया जरूर इंगित करें, मैं अपनी भूल सुधारना चाहूंगा|

      हटाएं
  38. इस कथा को शुरुऐ में पढ़ा था। अच्छा लगा।

    अब कमेंट जुड़ जाने से यह घूमकेतु पोस्ट बन गयी। लम्बी पूछ (कमेंट) वाली पोस्ट!

    मेरा इतने दिनों का ब्लॉग पढ़ने का अनुभव है पोस्ट कोई भी हो, विषय कैसा भी हो, मुद्दा कोई हो - आमतौर पर हम लिखते वहीं हैं जो हमारे मन में होता है। :)

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  39. आपसे असहमत कौन है? और ज्यादा तसदीक करने के लिए 'खग समझे खग ही की भाषा' को साथ साथ 'खग ही समझे खग की भाषा' भी मान रहे हैं, राईट है न अब? :)

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  40. ऐसे दृश्‍य जानवरों के मध्‍य दिखायी देते हैं लेकिन सभ्‍य इंसानों के मध्‍य नहीं। इस पोस्‍ट पर इतना विमर्श हो चुका है कि अब और नहीं। आजकल बहु और पोता अमेरिका से आए हुए हैं इसलिए समय नहीं मिल रहा है।

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  41. माफ़ कीजिये - लेकिन मैं PETA वालों से सहमत हूँ | यह सब दृश्य जानवरों में कभी दिखाई नहीं देंगे कि कई नर समवेत हो कर एक मादा का अपमान करें / उसे परेशान करें | इस में तो मनुष्यों का ही एकाधिकार है :( ( और उसमे भी हमारे "महान भारत" जैसे राष्ट्र का, जहां संस्कृति की दुहाई देकर स्त्री को पुरुष से नीचे दिखाने का रिवाज है | अनपढ़ तो अनपढ़, पढ़े लिखे स्व-निर्वाचित संस्कृति के रक्षक भी "संस्कृति" के नाम पर ब्लोग्स पर लम्बी बहसें करते हैं कि सुहागन स्त्री को सुहाग चिन्ह पहनने चाहिए )

    जानवरों को हम इसलिए बदनाम कर सकते हैं की वे तो बेचारे ब्लॉग पर अपना पक्ष लिख नहीं सकते न ? तो मनुष्य अपनी महानता दिखाने के लिए सब क्रूरता के दुर्गुणों को पशुओं पर आरोपित कर देते हैं |

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  42. पोस्ट से ज्यादा अच्छा लगी उसपर हुई स्वस्थ चर्चा और बहस... लगभर सारी पहलू पहले ही निचोड़े जा चुके हैं इसलिए फिर से वही बातें दुहराने का कोई मतलब नहीं बनता... लेकिन ऐसा कहीं न कहीं मुझे भी लगा कि लेखक लड़के के प्रति कुछ ज्यादा क्रूर हो रहा है... ऐसी विस्तृत चर्चा को ट्रिगर करने वाली पोस्ट के लिए शुक्रिया...

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  43. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  44. वैसे वो लड़का जो हरकत कर रहा था कुछ वैसी ही हरकत मैं आजकल लड़कियों को भी करते देखता हूँ... हाँ उनकी आँखे नहीं देखी कि उनमे मासूमियत रहती है या फिर कामुकता, वासना, लम्पटता.
    आजकल की लड़किओं की सच्चाई रेखांकित करने से हर कोई 'विक्रम' बचता है.. वरना अब आपसे क्या कहना - बड़ी फजीयत होती है..

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  45. Hmmmmmm.
    Aap to vaad vivaad pratiyogita karvane ke master ban gaye jee......

    :)

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  46. आज आपके ब्लॉग पर बहुत कुछ सीखने को मिला ।

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    1. मैं मानता हूँ कि विद्वान\विदुषी कहीं से भी कुछ सीखने में सक्षम होते हैं, आभार स्वीकारें।

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  47. क्या हमने ब्लॉगिंग का ये दौर भी देखा हैं!!!!

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  48. दिल्ली तो है ही दिलवालों की
    विक्रम गलत जगह था
    उसे कहीं और होना चाहिए था

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