रविवार, मई 13, 2012

पैमाने कैसे कैसे? ...


कल शाम बैंक से घर लौटा तो देखा पिताजी के साथ चौधरी अंकल बैठे हैं। यूं तो पडौस में ही रहने वाले हैं लेकिन आजकल किसी के घर आना जाना विशेष काम से ही होता है जैसे शादी ब्याह का निमंत्रण देना हो या किसी की मृत्यु या गंभीर बीमारी जैसी कोई बात हो। वो जमाने अब नहीं रहे जब पडौस की रसोई की महक से अपने घर बनी दाल सब्जी अपना स्वाद खो बैठती थी और हक़ से उधर से साग मंगवा लेते थे।बगल वाले घर में बाप-बेटा या भाई-भाई या पति-पत्नी के झगडे की आवाज सुनाई पड़े तो जाकर समझाने, डांटने के लिए खून का रिश्ता होना जरूरी नहीं होता था। अब हम सब खाए, पिए, अघाए लोग हो चुके हैं, 'माईंड योर ओन बिजनेस' जितनी अंगरेजी भी जानते ही हैं।

चौधरी अंकल को देखकर थोड़ी हैरानी भी हुई और कुछ खटका सा भी लगा, आज पता नहीं कैसे इधर का रास्ता भूले हैं? मालूम चला, एकदम से तेज बरसात शुरू हो गयी थी और वो उस समय हमारे दरवाजे के सामने से ही निकल रहे थे। हँसते हुए कहने लगे, 'अन्दर नजर नजर पडी तो भाई साहब बैठे दिख गए और मैंने सोचा कि मुलाक़ात हुए बहुत दिन हो गए हैं। बारिश से भी बचाव हो गया और भाई साहब से भी राम राम हो गयी।' कुछ देर बार जाने लगे तो मेरे गाल पर प्यार से थपथपाकर गए, और बयालीस साल का मैं, उस स्पर्श को देर तक महसूस करता रहा।

जाने कितनी बार सुन चुका हूँ पापा से और दादाजी से भी इन चौधरी अंकल की कहानी, कल फिर छेड़ कर बैठ गया। मेरे दादाजी और इनके ताऊजी पगड़ीबदल भाई बने हुए थे। कहानी कहो या किस्सा, शुरुआत होती है सन सैंतालीस के पार्टीशन से। एक काफिला चला आ रहा था उस जमीन को छोड़कर जो कल तक हिन्दुस्तान ही था, उस जमीन की तरफ जो अब उनके हिस्से का हिन्दुस्तान घोषित किया जा चुका था। कितने ही पूरे परिवार और कितने ही आधे अधूरे परिवार, जवान आदमी औरत से लेकर बच्चे, बूढ़े, बीमार, विकलांग, गर्भवती महिलायें भी उस भीड़ में शामिल थे। एक आदमी बीमार था और बीमारी के चलते बार बार काफिले से पीछे रह जाता था। ऐसे ही एक मौके पर वो काफिले से कटा और कुछ लोगों के सबाब का सबब बनते हुए काट डाला गया। उसके परिवार के दुसरे लोगों के साथ उसकी गर्भवती स्त्री भी काफिले में शामिल थी, एक के जाने से कारवाँ तो नहीं रुका करते सो वो काफिला भी चलता ही रहा। जालंधर पार करने के बाद काफिला तितर बितर होना शुरू हो गया, जिसके जिधर सींग समाये वो उधर ही बसकर जिन्दगी की सलीब ढोने लगा।

दिल्ली आने के महीने भर के बाद उस महिला ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिनका जिक्र मैंने पोस्ट के शुरू में चौधरी अंकल के रूप में किया है। संक्रमण काल था, कुछ लोगों ने इनके ताऊजी जोकि घर के मुखिया थे, को अनुज-वधू, जो विवाह के साल भर बाद ही विधवा हो चुकी थी के पुनर्विवाह की सलाह दी। अपनी पत्नी और मेरे दादा-दादी की मौजूदगी में ताऊजी ने अनुज-वधु को पुत्री मानते हुए ये बात शुरू की लेकिन उस मुश्किल से बीस साल की महिला ने एकदम से उस बात को खारिज कर दिया। शादी भी हो चुकी, माँ भी बन चुकी। पति नहीं रहे लेकिन पुत्र तो है, चाहे मजदूरी करके जीवन काटना पड़े लेकिन खुद का और बेटे का पेट भर ही लेगी। बेटे ने भी कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया, पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी में आ गया। यही हैं हमारे चौधरी अंकल। अब तो असिस्टेंट कमिश्नर की पोस्ट से रिटायर भी हो चुके, माताजी और पत्नी स्वर्ग सिधार चुकी हैं और आज भी उस परिवार की शराफत, चरित्र और विनम्रता की लोग मिसाल दिया करते हैं।

बात बहुत मामूली सी लग सकती है सबको, क्योंकि ऐसे किस्से एकाध नहीं बल्कि बहुतायत में मिल जायेंगे बशर्ते किसी के पास इन बातों के लिए समय हो लेकिन मेरे लिए बहुत अहम् है। अब और भी ज्यादा क्योंकि ब्लोगिंग जैसी चीज से वास्ता है अपना। इस कहानी के पात्रों को जब ब्लोगिंग में वर्णित पैमानों से नापता हूँ तो हैरान हो जाता हूँ। उस महिला को बोल्ड माना जाए या नहीं जिसने अपनी जिन्दगी कैसे बितानी है इस पर दोटूक निर्णय ले लिया था? क्या उसे अबला कहना नारीशक्ति का अपमान नहीं होगा? उसकी ससुराल वालों को, उसके जेठ जेठानी जिन्होंने कम से कम बीस साल तक पहले उन माता-बेटे की रोटी, कपडे की जरूरत पूरी की उसके बाद अपनी और अपने बच्चो के बारे में सोचा, इंसान माना जाए या नहीं? क्योंकि मैंने तो एकता कपूर के सीरियल्स की तरह यहाँ भी ये पाया है कि ससुराल का मतलब ही है साजिशों का घर।

और सबसे ज्यादा इन चौधरी अंकल के बारे में सोच रहा हूँ, अब कुछ ब्लोगीय बातें।

महीना भर पहले जिन दिनों पाकिस्तानी सदर अजमेर जियारत के सिलसिले में भारत आये थे और हम मेहमाननवाजी में बिछे जाते थे, उन्ही दिनों में एक अतिसक्रिय ब्लॉगर महोदय की एक पोस्ट देखी। उन दिनों फिर से चर्चाओं में आये 'हाफिज सईद' के बारे में लिखी पोस्ट, टाईटिल से लेकर कंटेंट तक उस मोस्ट वांटेड के कारनामों को इसी बिला पर जस्टिफ़ाईड करती पोस्ट थी जिनसे हमारे चौधरी अंकल और उन जैसे हजारों लाखों लोगों को होकर गुजरना पडा था। कमेन्ट किया था, लेकिन अमूमन जैसा होता है वैसे ही वो कमेन्ट बिना छपा ही रह गया।

दंगों में लूटपाट, ह्त्यायें, मार-काट, अंग भंग, शील भंग ही हुआ करते हैं, अगर इनकी वजह से किसी का आतंकवादी बनना जायज होता है तो हमारी तरफ का पलड़ा यकीनन भारी होगा। उस शख्स के घर वाले यदि दंगों में मारे गए थे, उनकी जमीन अगर लूट ली गयी थी तो पाकिस्तान से आने वाले लाखों शरणार्थी अपनी जमीनें सर पर लादकर इधर नहीं लाये थे। उनके साथ भी यही सब हुआ था और ज्यादा हुआ था। और ये सब रुका तभी था, जब उसी भाषा में जवाब मिलने लगे थे। हमारी तरफ तो इस बेसिस पर राज्यपोषित आतंकवादियों  की संख्या शायद दुसरे देश की सेना से भी ज्यादा होती।

लिंक नहीं दे रहा हूँ क्योंकि इससे हमारे ब्लॉगजगत की धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में पड जायेगी। ये शांति, सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता भी न गज़ब की चीजें हैं - एकदम से गज़ब तमाशा। एक पक्ष से भड़काऊ बाते हों तो कोई बांदा नई, इधर से उस भाषा में जवाब जाए तो एकदम से हलचल मच जाती है, वो भी पहले अपने खेमे में ही:) और यही बात है जो अपने पर और अपने समाज पर कभी गर्व करने का मौक़ा देती है और कभी शर्म का भी। गर्व इस बात का कि कम से कम सही गलत पर टोकने वाले तो मिल ही जाते हैं हमें, हम मानें या न मानें ये हमारे संस्कार लेकिन वो लोग कितने बदनसीब हैं जिनके गलत को भी सही कहना मजबूरी होता है एक पूरे फिरके के लिए। और शर्म इस बात के लिए कि अपने स्वार्थ, लोलुपता और डर को शान्ति, समरसता जैसे आवरण से ढंकते हैं हम लोग। बात बेबात जहर उगलना जरूरी नहीं लेकिन इन पक्तियों से सहमत हुए बिना रह सकते हैं क्या? -

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दन्तहीन , विषहीन और सरल हो।

अंत में, विकीपीडिया की विश्वसनीयता पर संदेह हो रहा है।  खोजने पर बता रहा है  कि  शुतुरमुर्ग भारत में नहीं मिलते।  कन्फ्यूज्ड अगेन, स्माईली कौन सा लगाना चाहिए,

:) या :( ?

                                                
                                                           
                                                                (गूगल से साभार )

61 टिप्‍पणियां:

  1. मैं सदके जाऊं...
    बलिहारी जाऊं....
    फिलहाल तो जाऊं, फिर लौट के आऊं...
    (गज़ब, गज़ब, गज़ब)n
    n=infinitive

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  2. भैया जी संसार अच्छे लोगो से भरी पड़ी बस उनसे आपकी मुलाकात कब और कैसे हुई .
    खुबसूरत वाकये के लिए धन्यवाद् .सहजता और सरलता के लिए आभार .

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  3. बताते थे कि अपने घर की रसोई के पुलाव की खुशबू जितने घरों तक पहुंचे, उतने घरों तक न्यौता दे आओ और तब जो बचे वो अपने घर वालों को खिलाओ.. सुनकर किसी परीकथा सा लगता है.. अब ना वो लोग रहे, न वो समाज.. आज तो अपने घर के लोगों को कूदे में पड़े जूठन पर गुज़ारा करने दो मगर, कैद में पड़े देशद्रोही को बिरयानी मुहैय्या करवाओ... आज डॉ. अरविन्द मिश्र कहते हैं कि "आज पंडित तो केवल व्यंग स्वरुप ही कहा जाता है".. नेता कहा जाए किसी को जूते उतारकर मारने दौडता है.. वैसे ही धर्मनिरपेक्षता भी गाली हो गई है.. चाहे देश हो या ब्लॉग जगत हो.. अच्छा हुआ कि मुझे चौधरी अंकल जैसे लोगों के दृष्टांत देखने को मिलते हैं और धर्मनिरपेक्षता वाले ब्लॉगों से अपनी दूर से ही जय राम जी की (यह कहना साम्प्रदायिकता कि श्रेणी में तो नहीं आएगा ना???)

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    1. सलिल जी,
      पंडित शब्द तो विद्वान का पर्याय है, विद्वता विद्या से है। और विद्या विनयवान को शोभा देती है।
      किन्तु धर्मनिरपेक्षता से लोग पक चुके है। विद्वान अब मुखर हो रहे है। वस्तुतः ताने और व्यंग्य के दबाव में एकता को अधिक दिन मजबूर नहीं किया जा सकता। सहिष्णुता और सद्भाव विवश कर टिकाए नहीं रखा जा सकता। यथार्थ अब स्पष्ट होता जा रहा है।

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    2. @ सलिल भाई:
      धर्मनिरपेक्षता मखौल बन गयी है, इसका अर्थ क्या है और इसे किस अर्थ में इस्तेमाल किया जा रहा है, यही देखकर हंसी आती है और क्षोभ भी| और श्रेणा-श्रेणी अपनी ऐसी तैसी करवाएंगे, सांप्रदायिक तो आप हो ही, एकरा में कौनो शक है का? गीता सुनते हैं, हमारे ब्लॉग पर आते हैं, सांप्रदायिक तो आप हो ही:)

      @सुज्ञ जी:
      अवसरवादी धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और सद्भाव अपने को चुभती है, अपना दिल औरों की तरह बहुत विशाल नहीं है:(
      विद्वानों का काम अलख जगाना ही होता है, आज हमें समझ आ रहा है तो कल और भी समझेंगे|

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  4. वो दौर ही अलग था बंधु। वो एक सीरियल आता था - 'सांझा चूल्हा' वैसा ही कुछ होता था हर जगह। लेकिन धीरे धीरे लोग आत्मकेन्द्रित होते गये। अब तो वर्चुअल वर्ल्ड ने और ज्यादा इस तरह की आत्मकेन्द्रियता बढ़ाई है। कहने के लिये भले कहते हैं कि सोशल साईट पर हैं, फलां देश वाले से चैट कर रहे हैं लेकिन पड़ोसी से बात करने तक में एक तरह की कतराहट झलकती है।

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  5. "बगल वाले घर में बाप-बेटा या भाई-भाई या पति-पत्नी के झगडे की आवाज सुनाई पड़े तो जाकर समझाने, डांटने के लिए खून का रिश्ता होना जरूरी नहीं होता था।...."

    ’वो जमाने गये जब मियाँ को देख के फ़ख्ता खुद-ब-खुद उड जाया करती थी!’

    वैसे उडने से याद आया, जो शुतुरमुर्ग भारत में मिलते हैं वो उडते भी है( भले ही Air India के सहारे!) असली शुतुरमुर्ग (जहाँ भी मिलते हों) भारत में मिलने वालों की तरह ही आफ़त या परेशानी आने पर मूँह रेत में जरूर घुसा लेते हैं कि शायद उस परेशानी से बचने का यही एक रास्ता नज़र आता है!।

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    1. अब फाख्ता उडाये से भी न उड़े है:)


      my version - भारत में मिलने वाले शुतुरमुर्ग, असली शुतुरमुर्ग (जहाँ भी मिलते हों) की तरह ही आफ़त या परेशानी आने पर मूँह रेत में जरूर घुसा लेते हैं कि शायद उस परेशानी से बचने का यही एक रास्ता नज़र आता है!।

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  6. सारथक सन्देश देता संस्मरण!!

    पहले सहनशीलता का बल पैदा करे, फिर दुखडे रोए तो काम बने।
    सहिष्णुता का इतना भी शोषण न हो कि अन्याय के मगरमच्छ आंसू ढ़लकाने को कांधे ही न मिले!!

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  7. wonderful पोस्ट !!
    आभार |
    बंटवारे की पीड़ा मैं जानती हूँ - मेरे ननिहाल से भी, इनके घर से भी - दोनों और के लोगों से यह पीड़ा सुनी है | :( |

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    1. सच तो ये है शिल्पाजी, बंटवारे का दर्द ज्यादा से ज्यादा हमारी पीढी तक रहता बशर्ते नेकनीयती का पालन होता रहता|

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  8. @ पैमाने ,
    लोग जैसे जैसे पैमाने वैसे वैसे !

    ( बटवारे के मसले पर एक बड़ी टिप्पणी लिखी थी ! सोच रहा हूं ! उचित लगा तो आपको मेल कर दूंगा )

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    1. जब भी उचित लगे अली साहब, इन्तेजार रहेगा आपके बहुमूल्य विचारों का| आप उनमें से हैं जिनका दिल से सम्मान करता हूँ|

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  9. अपने मज़हब के लिये एक पवित्र राष्ट्र के नाम पर बहकाये गये धर्मान्ध लोग 65 साल तक कीड़े-मकौड़ों से भी बदतर ज़िन्दगी जीने के बाद आज पाकिस्तान में इस बहस में उलझे हैं कि उनकी पिछली पीढी ने अपने को भारत की महान परम्परा से काटने की मूर्खता क्यों की। लेकिन सोचने की बात यह है कि उस जनसमूह को यह समझ आने के लिये 65 साल तक अपने सीने पर अपनों की गोलियाँ खानी पड़ीं (बंगलादेश वाले थोड़े अग्रणी निकले)। दुःख की बात यह है कि भारत में अभी भी ऐसे कई अभागे समूह मौजूद हैं जो वहशियत मे अपना जाति-अभिमान ढूंढ रहे हैं। पिछले दिनों एक नॉट-सो-नाइस कम्युनिस्ट ब्लॉग पर भी हूजी नामक इस्लामिक आतंकवादी संगठन के कसीदे पढे जा रहे थे। वहाँ लिखी मेरी टिप्पणी भी प्रकाशित नहीं की गयी। सच यह है कि कुछ लोग जब तक खुद अन्धे कुएं में गिरते नहीं तब तक कुओं के अस्तित्व को ही नकारते रहते हैं। हमारी-आपकी सदाशयता ऐसे लोगों को बचा नहीं सकती। वे और उनकी भावी पीढियाँ अभिशप्त हैं उनके पाप का फल भोगने को!

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    1. नॉट-सो-नाइस कम्युनिस्ट ब्लॉग और ऐसे ही अनेक ब्लॉग के मालिक सच से बिदकते हैं अनुराग जी... ये सच को स्वीकार करने के मूड में नहीं...

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    2. नॉट-सो-नाइस भी और कम्युनिस्ट भी, how is it possible? I have heard that Left is always Right :)
      अभिमान तो सरजी रूप, धन, बल किसी का नहीं रहता और आज के युग में जाति अभिमान? सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या ...

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  10. सामान्य बतकही में कितनी गंभीर बातें , पहले किसी को डांटने समझाने के लिए खून के रिश्ते की जरुरत नहीं होती थी , आज खून के रिश्ते ही सबसे पहले अपमानित करते हैं , समय बहुत बदला है !
    दंगे फसाद से प्रभावित सभी लोंग आतंकवादी नहीं बनते , भारतीय शरणार्थियों से बेहतर इसका उदाहरण कौन दे सकता है , सही है !

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  11. हम तो पलक बिछाये बैठे रहते हैं, यह जानकर भी कि वे मौका मिलते ही कत्ल कर देंगे...

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  12. Behad achha laga aalekh.....Chaudharee ankal jaisi sainkdo kahaniya ghati hongi lekin aapne likha bahut khoob hai.

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  13. 'माईंड योर ओन बिजनेस' सीखा बहुतों ने है, कुछ तो तख्‍ती लगाए ही बैठे हैं. शानदार प्रस्‍तुति.

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  14. हमारे ब्लॉगजगत की धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में पड जायेगी....

    no comment...

    jai baba banaras.....

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  15. aap vindas likte hain.....ek-dum 'khara'......itne samvedanshil content pe kuch sujuh nahi raha......hamare inshan hone ke liye
    jis pahloo ka hona, bachpan se samjhaya gaya......sochta hoon uske
    'paimane'....pe kitna khara rah paya hoon.....

    ab apke likhe ko achha nahi kah paoonga.....sayad apko achha nahi
    lagta?

    pranam.

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    1. hamse kaa bhool huyi jo ye sajaa hamka milee...

      kaahe rooth gaye bhai naam rashi?

      achha baba, achha mat kahna lekin bura lage tab to kahoge na? kah dena please....

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  16. हम तो दादी से उनकी आपबीती सुनते रहते हैं कि कैसे लडकियों को रजाईयों के नीचे दबाकर और ऊपर आदमी बैठकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाते थे।
    मेरे दादाजी भी लाहौर में दो दुकानें छोड आये, काश ले आते सिर पर और आज दिल्ली में कहीं भी रख देते तो हमें भी नौकरी ना करनी पडती। :)
    धर्मनिरपेक्षता की अपेक्षा केवल पूरा पाजामा पहनने वालों से ही करते हैं इस देश में लोग

    वैसे एक बात क्लियर कर दूं कि मैं भी शतुरमुर्ग की प्रजाति का हूं और भारत में ही मिलता हूं

    प्रणाम

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  17. सरलता से गंभीर बात कह जाना यह आपकी लेखन शैली रही है। कमाल के संस्मरण का उद्धरण देकर आपने मज़हब के नाम पर आंतकवादियों की भी तरफ दारी करने वालों की बड़ी शालीनता से खबर ली है। बनारसी भाषा में कहें तो...बड़ी महीनी से चिकोटी कटला गुरू!

    भौतिकवाद में पेट बड़ा हो गया और दिल छोटा। दूसरे को क्या कहें..अपने को ही देखें। हमीं बदल गये तो और क्यों न बदलें। पहले पिताजी हमसे कम कमाते थे और हमसे चार गुने बड़े परिवार का लालन-पालन करते थे फिर भी पड़ोसियों की मदद के मामले में हमसे लाख दर्जे उदार थे। गर्मी के दिन में एक बड़ा हिरमाना(तरबूज) लाते और हम मुँह में लार टपकाये पास-पड़ोस बांटते फिरते। पहले जाओ फलां के घर यह टुकड़ा पहुँचा के आओ। देर करोगे तो खराब हो जायेगा। अब! अब खा पी कर बचा हुआ फ्रिज में रख देते हैं। कोई मेहमान आया तो खिलायेंगे! नहीं आया तो दूसरे दिन काम आयेगा।:) ये संस्कार कब बदले ? किसने कहे बदलने को ? क्या कहूँ...!

    तुलसी के पौधे बोये थे
    दोहे कबीर के गाये थे
    सत्य अहिंसा के परचम
    जग में हमने फहराये थे।

    नैतिकता के वे ऊँचे पैमाने कहाँ गये!

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    1. गाय के(और कहीं कहीं कुत्ते के हिस्से की भी) रोटी अब शौहर को खिला दी जाती है जैसे, पैमाने टूट गए:)

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    2. बिलकुल ठीक कहते हैं देवेन्द्र जी :(

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  18. संजय जी, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आज सिर्फ एक विशेष वर्ग का ही पक्ष लिया जाता है.. अपने दूसरे पक्ष की पीड़ा जाहिर की या दोनों के गुण-दोष दिखाए तो आप धर्मनिरपेक्ष नहीं रह जायेंगे... तथाकथित सेकूलर जमात आपको तमाम मोर्डन गालियों से नवाज देंगे... खैर सच के पैरोकारों को इन ढकोसले बाजों से डरना भी नहीं चाहिए जो सच है कहा जाना चाहिए... आपकी इस पोस्ट ने १९४७ के उन पीड़ितों की पीड़ा को प्रस्तुत किया है जिन्हें सेकूलर जमात पीड़ित मानती ही नहीं है बल्कि हमलावर ठहराया जाता है....

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    1. धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही तो जानना है लोकेन्द्र जी मुझे| शब्दकोष कुछ और कहता है, नेता लोग कुछ और कहते हैं, जनता कुछ और समझती है, सब घालामाला हुआ पड़ा है|

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  19. महर्षि,
    ऊ समय ज़रा बीजी थे हम, जब आपका पोस्ट का पदार्पण हुआ...
    आपका लोहा तो हम मानते ही हैं...ऊ कहते हैं न सौ सोनार की एक लोहार की...हम एतना दिन से चिचिया रहे हैं, पता नहीं कोई सुनता भी है या नहीं...
    धरमनिरपेक्ष का चोला हम उतार फेंके हैं अब..
    अरे कोई माने कि न माने हम तो आज भी, किसी का भी बच्चा हो ग़लत काम करता है तो गरियाने से पीछे नहीं हटते..और हमरे बच्चे की ग़लती हो तो कोई भी रोके टोके यही उम्मीद करते हैं....ज़माना नहीं बदलता, आप बदलते हैं इसीलिए ज़माना बदलता है...हमसे ज़माना है ज़माने से हम नहीं...
    और हाँ, किसने आपसे कह दिया शुतुरमुर्ग भारत में नहीं मिलता, अरे यही तो मिलता है यहाँ, बहुतायत में..
    बल्कि एक ठो सजेसन देते हैं, अब भारत को अपना राष्टीय पक्षी शुतुरमुर्ग को ही बना लेना चाहिए...काहे कि भारत की जो बहुसंख्यक जनता है, ऊ का है ...? शुतुरमुर्ग ही तो है...
    बात करते हैं...!

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    1. बिजी काहे में, कौन सा आपके कनाडे में धान की रोपाई कर रही थीं उस समय आप? :)
      लोहार होते तो शान से कहते ये बात, खाली पीली लिखने बोलने के अलावा किसी के काम आने लायक कुछ चीज तो बनाते कम से कम|
      गलती पर रोकने टोकने वाली बात से सौ टका सहमत, कोइ अपना समझता है और सुधार चाहता है तभी टोकता है|
      आप चिचियाती नहीं, फरमाती हैं, और बहुधा दुरस्त ही फरमाती हैं| बहुतों को आप पर गर्व है, मुझे यकीन भी है|
      और शुतुरमुर्गी आईडिया हमने अपने ब्लोगाचार्य से चुराया था, आप हमसे हाईजैक किये ले जा रही हैं सजेसन देने के नाम पर - ले जाईये, देखी जायेगी|

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  20. ऐसे संस्मरण बहुत कुछ सोचने पर विवश करते हैं और बार बार यह भी याद दिलाते हैं कि हम इतिहास से सबक नहीं लेते ....उदाहरणों से सीखते नहीं ....
    हाँ ये चित्र वाले शुतुरमुर्ग यहाँ सचमुच नहीं मिलते ..जो मिलते हैं उनका चेहरा नहीं दिखता..रेट में जो दबा रहता है !

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  21. उत्तर
    1. वही माईंड रहे हैं बाबाजी..

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    2. कहाँ माइंड कर रहे हैं, मुझे तो नहीं लगता, दोस्त शूतरमुर्ग सर रेत में धंसा देता है, पर ... पर 'हमलोग' वही वाले हम लोग नून, तेल धनिया में सर घूसा कर रहते हैं, ये हमें सिखाया नहीं गया, मैडम की मेहरबानी से 'हमलोग' सीख गए हैं, .. बच्चे पालने हैं, इंग्लिश की शिक्षा दिलानी है, कल किसी काल सेंटर में एडजेस्ट करना है, अपनी नौकरी बचानी है, कब समय है 'हम लोगों' के पास की दायें बाएं देखे,

      और आप गुस्ताखी कर रहे थे, इसलिए आपके ही शब्दों को उधार ले कर आपसे ही बोला 'माईंड योर ओन बिजनेस'

      भैया - जितना भी ध्वंस हो जाए - आज भी पेट्रो डोलर में इतना तो दम है कि कम से कम ३०-४० हिंदी ब्लोग्गरों को पाल सकें, बाकी तो सब 'शर्मसार' (भीड़ - जो तंत्र में बदल जाती है) होकर उनके साथ चलने के लिए सदा तैयार रहते हैं...

      खुदा खैर करे,

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    3. अगर उनका फूफा अमेरिका कुछ घटबढ़ न करे तब भी ज्यादा से ज्यादा ५०-६० साल का पेट्रो-मसाला बचा होगा, उसके बाद?
      फिर खुदा कौन सा अकेली किसी कौम मजहब का है, हमपे खैर न होगी? और अगर हम आज एलिजिबल नहीं भी हैं तो क्या हुआ. कल को हो जायेंगे, हम भी कल्लेंगे परिवर्तन, विचारधारा परिवर्तन| फिर कम से कम हमारी हर गलती को सही तो ठहराएंगे हमारे बन्दे भी और काफिर भी|

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  22. सापेक्षता का सिद्धांत...बाबा आइन्स्टाइन के पहले अस्तित्व में था...और उनके निष्पादन के बाद से वैध हैं...निरपेक्षता के लिए धर्म का होना भी तो ज़रूरी है...बन्धु...जिसने धर्म अपना लिया...उसका कोई संप्रदाय या मज़हब नहीं होता...पूरी सृष्टि ही उसे विधाता की देन लगती है...सच को कहने और सुनने के लिए कलेजा चाहिए...खूब कही आपने...

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    1. सही कहा सरकार, जिसने धर्म अपना लिया उसके लिए तो 'न कोई बैरी, न ही बेगाना' ध्येय वाक्य हो जाता है|

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  23. बेनामी16 मई 2012, 1:57:00 am

    Mosam Kaun Ji,

    kab tak aap itna bekaar likhte rahenge ji ???

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    1. जब तक आप का प्यार मिलता रहेगा, तब तक लिखते रहेंगे जी|

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    2. बहुत अच्‍छा लिखते हैं आप

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  24. । ये शांति, सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता भी न गज़ब की चीजें हैं - एकदम से गज़ब तमाशा।
    sir hai to sab tamaasha hi

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  25. संजय जी हमारी सच्चाई तो वही है पर ऐसे लोगों का बोलवाला कुछ बढ रहा है जो खलनायक को नायक बनाने पर तुले हैं । हर बुरी बात की वकालत करने में मनोविज्ञान व तर्को को घुसाते हैं । समय बेशक बदल रहा है फिर भी आपके चौधरी जी की थोडी सी झलक कहीं कहीं अब भी मिल जाती है और वह आस्था को बचाए रखने काफी लगती है ।

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  26. बहुत अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़कर। इसके गाल थपथपाने का मन कर रहा है। प्यारी पोस्ट! :)

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    1. अनूप जी, बाल अट्खेली थोडी न जो गाल थपथपाने से काम चल जाएगा :) पीठ थपथपाएं साहसी पोस्ट को पुख्त आधार मिल जाएगा। :)

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  27. बेनामी19 मई 2012, 10:07:00 am

    बुरा- भला?
    तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय कवि 'महफूज़ अली' की कविता के जर्मनी के पाठ्यक्रम में शामिल होने की खबर न सिर्फ ब्लोग्स पर देखने को मिली, बल्कि उनके ब्लॉग पर 'दैनिक हिन्दुस्तान' समाचार पत्र में इस आशय का समाचार छपने की तस्वीर भी है| अखबार से इस समाचार का स्त्रोत पूछा गया है और जवाब अभी प्रतीक्षित है और शायद प्रतीक्षित ही रहेगा| सम्बंधित जर्मन प्रकाशक से संपर्क करने के बाद पता चला कि उनके यहाँ ऐसा कुछ नहीं छपा है| प्रकाशक के डिटेल्स इस प्रकार हैं -
    STARK mbH & Co.
    Bachstr. 2
    85406 Zolling
    Tel. 0180 3 179000 Fax 0180 3 179001
    Handelsregister München HRA78578
    Geschäftsführer Dr. Detlev Lux
    info@stark-verlag.de
    अपने फेसबुक प्रोफाईल पर महफूज़ अली खुद को जिस अंतर्राष्ट्रीय संस्था का चेयरमेन और सी.ई.ओ. बता रहे हैं, उस स्वयंसेवी संस्था में ऐसा कोई पद ही नहीं है और इस नाम का कोई अन्य अधिकारी भी नहीं है| संस्था का विवरण इस प्रकार है -
    Jana Parejko
    Mental Health Resource League for Mchenry County (MHRL)
    info@mhrl.org
    (815) 385-5745
    ये सरासर धोखाधड़ी है, हमारे आपके विश्वास के साथ धोखा, हमारी सद्भावनाओं के साथ धोखा| जो नहीं है, खुद की उन उपलब्धियों का बखान खुद करना और दूसरों को धोखे में रखकर औरों से भी अपना महिमामंडन करवाना, कहीं से भी शराफत का काम नहीं है|
    ब्लोगर्स मीट में, पुरस्कार वितरणों में या किताबें छपने छपवाने में हजारों रुपये खर्च करने वाले आप लोग सौ-पचास रुपये खर्च करके इन फोन नम्बर्स पर संपर्क करके असलियत जान सकते हैं और यदि ये भी मुश्किल है तो ईमेल एड्रेस तो है ही| मेरी विश्वसनीयता संदिग्ध लगे तो आप महफूज़ अली के ब्लॉग से इन प्रकाशक संस्थान और दुसरे संगठन का नाम नोट करके नेट से खुद भी इन नम्बर्स और आई.डी. की जानकारी ले सकते हैं| ब्लॉग और फेसबुक के इनके प्रोफाईल का स्नैप शोट सुरक्षित है, क्योंकि इन्हें बदल दिए जाने की पूरी संभावना है| झूठ के पाँव नहीं होते|
    किसी लोभ में या लिहाज में हम लोग इन बातों को नजर अंदाज करते हैं तो ये झूठ के प्रचार प्रसार में हमारी सहभागिता है| फैसला आपके हाथ में है, आपको क्या स्वीकार्य है - छले जाना या सच्चाई को जानना?

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  28. हमारे यहाँ ऐसे बहुत से किस्से आज भी जीवित हैं जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती है- जब हम पाकिस्तान से आए थे....
    उस समय बोलड निर्णय लेने की कूव्वत रखने वाले लोगों की कमी नहीं थी. दल दिए गए लेकिन फिर उठ खड़े हुए.

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  29. बहुत सुन्दर , बहुत बढ़िया , सब मिला शुतुरमुर्ग की अच्छी व्याख्या

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  30. वैसे एक टिप्पड़ी मई और करना चाहूँगा :-

    तुम चाहत हो भाईचारा ?? उल्लू हो ??
    तुमहू मारो हाथ करारा, उल्लू हो !

    कट्टरपंथी से हम तो भाग लिए ,
    तुमहू हो जाओ नौ दो ग्यारह ,
    उल्लू हो ,

    जवान बीवी छोड़ घर में ,
    जाओ न बिदेश ,
    अरे जैसे तैसे करो गुजारा , उल्लू हो ;)

    शुतुरमुर्गों के के लिए :-
    डीग्री ले के दर दर तुम भटको न ये भाई,
    अरे हवा भरो बको गुब्बारा , उल्लू हो :)

    कहत रहे न पड़ो प्यार के चक्कर में ,
    सुख के हो गए छुहारा , उल्लू हो !

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  31. बहुत सुन्दर प्रस्‍तुति।

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  32. बहुत मुश्‍कि‍ल है कड़वाहटों को झुठला पाना, पर दूसरों को देखकर हौसला ज़रूर बंधता है...

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  33. १५ दिन तो हो ही रहे होंगे ब्लॉग खोले, और आया तो वही, अतिविलम्बित
    शुतुरमुर्ग होता है न, बहुतायत में होता है और वो स्माइली भी ये वाली बनाता है :-|

    Ironic yet true:(

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  34. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  35. प्रभावशाली और सशक्त प्रस्तुति । आभार ।

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  36. देखकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि आपसे कुछ ही पीछे चल रहा हूं।

    नागार्जुन की कविता को लेकर मैंने एक पोस्‍ट लिखी उससे कोई महीनेभर पहले ही आप भी एक पोस्‍ट लिख चुके हैं। यह बात अलग है कि आपने एक अलग कोण से क्षमा को उठाया और मैंने अलग...

    लगता है जल्‍दी मिलना होगा... :)

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  37. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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